महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 827, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'माधव! अपने धर्मपर दृष्टि रखते हुए यदि हमलोग युद्धमें किसी समय अस्त्रोंके आघातसे मृत्युको प्राप्त हो जायँ तो वह भी हमारे लिये स्वर्गकी ही प्राप्ति करानेवाली होगी ॥ १५ ॥ मुख्यश्चैवैष नो धर्मः क्षत्रियाणां जनार्दन । यच्छयीमहि संग्रामे शरतल्पगता वयम् ॥ १६ ॥ 'जनार्दन! हम क्षत्रियोंका यही प्रधान धर्म है कि संग्राममें हमें बाण-शय्यापर सोनेका अवसर प्राप्त हो ॥ १६ ॥ ते वयं वीरशयनं प्राप्स्यामो यदि संयुगे । अप्रणम्यैव शत्रूणां न नस्तप्स्यन्ति माधव ॥ १७ ॥ 'अतः माधव! हम अपने शत्रुओंके सामने नतमस्तक न होकर यदि युद्धमें वीरशय्याको प्राप्त हों तो इससे हमारे भाई-बन्धुओंको संताप नहीं होगा ॥ १७ ॥ कश्च जातु कुले जातः क्षत्रधर्मेण वर्तयन् । भयाद् वृत्तिं समीक्ष्यैवं प्रणमेदिह कर्हिचित् ॥ १८ ॥ 'उत्तम कुलमें उत्पन्न होकर क्षत्रियधर्मके अनुसार जीवननिर्वाह करनेवाला कौन ऐसा महापुरुष होगा, जो क्षत्रियोचित वृत्तिपर दृष्टि रखते हुए भी इस प्रकार भयके कारण कभी शत्रुके सामने मस्तक झुकायेगा? ॥ उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् । अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कर्हिचित् ॥ १९ ॥ 'वीर पुरुषको चाहिये कि वह सदा उद्योग ही करे, किसीके सामने नतमस्तक न हो; क्योंकि उद्योग करना ही पुरुषका कर्तव्य-पुरुषार्थ है। वीर पुरुष असमयमें ही नष्ट भले ही हो जाय, परंतु कभी शत्रुके सामने सिर न झुकावे ॥ १९ ॥ इति मातङ्गवचनं परीप्सन्ति हितेप्सवः । धर्माय चैव प्रणमेद् ब्राह्मणेभ्यश्च मद्विधः ॥ २० ॥ 'अपना हित चाहनेवाले मनुष्य मातंग मुनिके उपर्युक्त वचनको ही ग्रहण करते हैं; अतः मेरे-जैसा पुरुष केवल धर्म तथा ब्राह्मणको ही प्रणाम कर सकता है (शत्रुओंको नहीं) ॥ २० ॥ अचिन्तयन् कंचिदन्यं यावज्जीवं तथाऽऽचरेत् । एष धर्मः क्षत्रियाणां मतमेतच्च मे सदा ॥ २१ ॥ 'वह दूसरे किसीको कुछ भी न समझकर जीवनभर ऐसा ही आचरण (उद्योग) करता रहे; यही क्षत्रियोंका धर्म है और सदाके लिये मेरा मत भी यही है ॥ २१ ॥ राज्यांशश्चाभ्यनुज्ञातो यो मे पित्रा पुराभवत् । न स लभ्यः पुनर्जातु मयि जीवति केशव ॥ २२ ॥