भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 830

तदिदं व्यसनं घोरं त्वया द्यूतमुखं कृतम् । असमीक्ष्य सदाचारान् सार्धं पापानुबन्धैः ॥ ७ ॥ 'तूने ही सदाचारकी ओर लक्ष्य न रखकर पापासक्त पुरुषोंके सहित भयंकर विपत्तिके कारणभूत ये द्यूतक्रीड़ा आदि कार्य किये हैं ॥ ७ ॥'

कश्चान्यो भ्रातृभार्यां वै विप्रकर्तुं तथार्हति । आनीय च सभां व्यक्तं यथोक्ता द्रौपदी त्वया ॥ ८ ॥ 'तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा अधम होगा, जो अपने बड़े भाईकी पत्नीको सभामें लाकर उसके साथ वैसा अनुचित बर्ताव करेगा। जैसा कि तूने द्रौपदीके प्रति स्पष्टरूपसे न कहने योग्य बातें कहकर दुर्व्यवहार किया है ॥ ८ ॥'

कुलीना शीलसम्पन्ना प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । महिषी पाण्डुपुत्राणां तथा विनिकृता त्वया ॥ ९ ॥ 'द्रौपदी उत्तम कुलमें उत्पन्न, शील और सदाचारसे सम्पन्न तथा पाण्डवोंके लिये प्राणोंसे भी अधिक आदरणीय उन सबकी महारानी है। तथापि तूने उसके प्रति अत्याचार किया ॥ ९ ॥'

जानन्ति कुरवः सर्वे यथोक्ताः कुरुसंसदि । दुःशासनेन कौन्तेयाः प्रव्रजन्तः परंतपाः ॥ १० ॥ 'जिस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार पाण्डव वनको जा रहे थे, उस समय दुःशासनने कौरवसभामें उनके प्रति जैसी कठोर बातें कही थीं, उन्हें सभी कौरव जानते हैं ॥ १० ॥'

सम्यग्वृत्तेष्वलुब्धेषु सततं धर्मचारिषु । स्वेषु बन्धुषु कः साधुश्चरेदेवमसाम्प्रतम् ॥ ११ ॥ 'सदा धर्ममें ही तत्पर रहनेवाले लोभरहित सदाचारी अपने बन्धुओंके प्रति कौन साधु पुरुष ऐसा अयोग्य बर्ताव करेगा? ॥ ११ ॥'

नृशंसानामनार्याणां पुरुषाणां च भाषणम् । कर्णदुःशासनाभ्यां च त्वया च बहुशः कृतम् ॥ १२ ॥ 'दुर्योधन! तूने कर्ण और दुःशासनके साथ अनेक बार निर्दयी तथा अनार्य पुरुषोंकी-सी बातें कही हैं ॥ १२ ॥'

सह मात्रा प्रदग्धुं तान् बालकान् वारणावते । आस्थितः परमं यत्नं न समृद्धं च तत् तव ॥ १३ ॥ 'तूने वारणावत नगरमें बाल्यावस्थामें पाण्डवोंको उनकी मातासहित जला डालनेका महान् प्रयत्न किया था, परंतु तेरा वह उद्देश्य सफल न हो सका ॥ १३ ॥'

ऊषुश्च सुचिरं कालं प्रच्छन्नाः पाण्डवास्तदा । मात्रा सहैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ १४ ॥