भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 833, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 833

इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए दुर्योधनको भाइयों-सहित सभासे उठकर जाते देख शान्तनुनन्दन भीष्मने कहा— ॥ २९ ॥ धर्मार्थावभिसंत्यज्य संरम्भं योऽनुमन्यते । हसन्ति व्यसने तस्य दुर्हृदो नचिरादिव ॥ ३० ॥ 'जो धर्म और अर्थका परित्याग करके क्रोधका ही अनुसरण करता है, उसे शीघ्र ही विपत्तिमें पड़ा देख उसके शत्रुगण हँसी उड़ाते हैं ॥ ३० ॥ दुरात्मा राजपुत्रोऽयं धार्तराष्ट्रोऽनुपायकृत् । मिथ्याभिमानी राज्यस्य क्रोधलोभवशानुगः ॥ ३१ ॥ 'राजा धृतराष्ट्रका यह दुरात्मा पुत्र दुर्योधन लक्ष्य-सिद्धिके उपायके विपरीत कार्य करनेवाला तथा क्रोध और लोभके वशीभूत रहनेवाला है। इसे राजा होनेका मिथ्या अभिमान है ॥ ३१ ॥ कालपक्वमिदं मन्ये सर्वं क्षत्रं जनार्दन । सर्वे ह्यनुसृता मोहात् पार्थिवाः सह मन्त्रिभिः ॥ ३२ ॥ 'जनार्दन! मैं समझता हूँ कि ये समस्त क्षत्रियगण कालसे पके हुए फलकी भाँति मौतके मुँहमें जानेवाले हैं। तभी तो ये सब-के-सब मोहवश अपने मन्त्रियोंके साथ दुर्योधनका अनुसरण करते हैं' ॥ ३२ ॥ भीष्मस्याथ वचः श्रुत्वा दाशार्हः पुष्करेक्षणः । भीष्मद्रोणमुखान् सर्वानभ्यभाषत वीर्यवान् ॥ ३३ ॥ भीष्मका यह कथन सुनकर महापराक्रमी दशार्हकुलनन्दन कमलनयन श्रीकृष्णने भीष्म और द्रोण आदि सब लोगोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ३३ ॥ सर्वेषां कुरुवृद्धानां महानयमतिक्रमः । प्रसह्य मन्दमैश्वर्ये न नियच्छत यन्नृपम् ॥ ३४ ॥ 'कुरुकुलके सभी बड़े-बूढ़े लोगोंका यह बहुत बड़ा अन्याय है कि आपलोग इस मूर्ख दुर्योधनको राजाके पदपर बिठाकर अब इसका बलपूर्वक नियन्त्रण नहीं कर रहे हैं ॥ ३४ ॥ तत्र कार्यमहं मन्ये कालप्राप्तमरिंदमाः । क्रियमाणे भवेच्छ्रेयस्तत् सर्वं शृणुतानघाः ॥ ३५ ॥ 'शत्रुओंका दमन करनेवाले निष्पाप कौरवो! इस विषयमें मैंने समयोचित कर्तव्यका निश्चय कर लिया है, जिसका पालन करनेपर सबका भला होगा। वह सब मैं बता रहा हूँ, आपलोग सुनें ॥ ३५ ॥ प्रत्यक्षमेतद् भवतां यद् वक्ष्यामि हितं वचः । भवतामानुकूल्येन यदि रोचेत भारताः ॥ ३६ ॥

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