महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 848, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसात्यकिने किंचित् मुसकराते हुए-से उन कौरवोंके इस अभिप्रायको इस प्रकार बताया—‘सभासदो! कुछ मूर्ख कौरव एक ऐसा नीच कर्म करना चाहते हैं, जो धर्म, अर्थ और काम सभी दृष्टियोंसे साधुपुरुषोंद्वारा निन्दित है। यद्यपि इस कार्यमें उन्हें किसी प्रकार सफलता नहीं प्राप्त हो सकती ।। १४ १/२ ।।
पुरा विकुर्वते मूढाः पापात्मानः समागताः ।। १५ ।।
धर्षिताः काममन्युभ्यां क्रोधलोभवशानुगाः ।
‘क्रोध और लोभके वशीभूत हो काम एवं रोषसे तिरस्कृत होकर कुछ पापात्मा एवं मूढ़ मानव यहाँ आकर भारी बखेड़ा पैदा करना चाहते हैं ।। १५ १/२ ।।
इमं हि पुण्डरीकाक्षं जिघृक्षन्त्यल्पचेतसः ।। १६ ।।
पटेनाग्निं प्रज्वलितं यथा बाला यथा जडाः ।
‘जैसे बालक और जड बुद्धिवाले लोग जलती आगको कपड़ेमें बाँधना चाहें, उसी प्रकार ये मन्दबुद्धि कौरव इन कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको यहाँ कैद करना चाहते हैं’ ।। १६ १/२ ।।
सात्यकेस्तद् वचः श्रुत्वा विदुरो दीर्घदर्शिवान् ।। १७ ।।
धृतराष्ट्रं महाबाहुमब्रवीत् कुरुसंसदि ।
राजन् परीतकालास्ते पुत्राः सर्वे परंतप ।। १८ ।।
अशक्यमयशस्यं च कर्तुं कर्म समुद्यताः ।
सात्यकिका यह वचन सुनकर दूरदर्शी विदुरने कौरवसभामें महाबाहु धृतराष्ट्रसे कहा—‘परंतप नरेश! जान पड़ता है, आपके सभी पुत्र सर्वथा कालके अधीन हो गये हैं। इसीलिये वे यह अकीर्तिकारक और असम्भव कर्म करनेको उतारू हुए हैं ।। १७-१८ १/२ ।।
इमं हि पुण्डरीकाक्षमभिभूय प्रसह्य च ।। १९ ।।
निग्रहीतुं किलेच्छन्ति सहिता वासवानुजम् ।
इमं पुरुषशार्दूलमप्रधृष्यं दुरासदम् ।। २० ।।
आसाद्य न भविष्यन्ति पतङ्गा इव पावकम् ।
‘सुननेमें आया है कि वे सब संगठित होकर इन पुरुषसिंह कमलनयन श्रीकृष्णको तिरस्कृत करके हठपूर्वक कैद करना चाहते हैं। ये भगवान् कृष्ण इन्द्रके छोटे भाई और दुर्धर्ष वीर हैं। इन्हें कोई भी पकड़ नहीं सकता। इनके पास आकर सभी विरोधी जलती आगमें गिरनेवाले फतिंगोंके समान नष्ट हो जायँगे ।। १९-२० १/२ ।।
अयमिच्छन् हि तान् सर्वान् युध्यमानाञ्जनार्दनः ।। २१ ।।
सिंहो नागानिव क्रुद्धो गमयेद् यमसादनम् ।
‘जैसे क्रोधमें भरा हुआ सिंह हाथियोंको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार ये भगवान् श्रीकृष्ण यदि चाहें तो क्रुद्ध होनेपर समस्त विपक्षी योद्धाओंको यमलोक पहुँचा सकते हैं ।। २१ १/२ ।।