महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्रं जहीति चाप्युक्तो जगाम त्रिदिवं ततः ।
ततो युद्धं समभवद् वृत्रवासवयोर्महत् ।। ५० ।।
तब त्वष्टाने कहा—‘इन्द्रको मार डालो।' उनके ऐसा कहनेपर वृत्रासुर स्वर्गलोकमें गया। तदनन्तर वृत्रासुर तथा इन्द्रमें बड़ा भारी युद्ध छिड़ गया ।। ५० ।।
संक्रुद्धयोर्महाघोरं प्रसक्तं कुरुसत्तम ।
ततो जग्राह देवेन्द्रं वृत्रो वीरः शतक्रतुम् ।। ५१ ।।
अपावृत्याक्षिपद् वक्त्रे शक्रं कोपसमन्वितः ।
ग्रस्ते वृत्रेण शक्रे तु सम्भ्रान्तास्त्रिदिवेश्वराः ।। ५२ ।।
कुरुश्रेष्ठ! वे दोनों क्रोधमें भरे हुए थे। उनमें अत्यन्त घोर संग्राम होने लगा। तदनन्तर कुपित हुए वीर वृत्रासुरने शतक्रतु इन्द्रको पकड़ लिया और मुँह बाकर उन्हें उसके भीतर डाल लिया। वृत्रासुरके द्वारा इन्द्रके ग्रस लिये जानेपर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवता घबरा गये ।। ५१-५२ ।।
असृजंस्ते महासत्त्वा जृम्भिकां वृत्रनाशिनीम् ।
विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादपावृतात् ।। ५३ ।।
स्वान्यङ्गान्यभिसंक्षिप्य निष्क्रान्तो बलनाशनः ।
ततः प्रभृति लोकस्य जृम्भिका प्राणसंश्रिता ।। ५४ ।।