भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 900, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 900

मेरी ही कृपासे अर्जुन अन्य धनुर्धरोंसे श्रेष्ठ हो गये हैं। इस समय जगत्में उनके समान दूसरा कोई धनुर्धर नहीं है ।। ६ ।। मित्रध्रुग् दुष्टभावश्च नास्तिकोऽथानृजुः शठः । न सत्सु लभते पूजां यज्ञे मूर्ख इवागतः ।। ७ ।। जैसे यज्ञमें आया हुआ मूर्ख ब्राह्मण प्रतिष्ठा नहीं पाता, उसी प्रकार जो मित्रद्रोही, दुर्भावनायुक्त, नास्तिक, कुटिल और शठ है, वह सत्पुरुषोंमें कभी सम्मान नहीं पाता है ।। ७ ।। वार्यमाणोऽपि पापेभ्यः पापात्मा पापमिच्छति । चोद्यमानोऽपि पापेन शुभात्मा शुभमिच्छति ।। ८ ।। पापात्मा मनुष्यको पापोंसे रोका जाय तो भी वह पाप ही करना चाहता है और जिसका हृदय शुभ संकल्पसे युक्त है, वह पुण्यात्मा पुरुष किसी पापीके द्वारा पापके लिये प्रेरित होनेपर भी शुभ कर्म करनेकी ही इच्छा रखता है ।। ८ ।। मिथ्योपचरिता ह्येते वर्तमाना ह्यनु प्रिये । अहितत्वाय कल्पन्ते दोषा भरतसत्तम ।। ९ ।। भरतश्रेष्ठ! तुमने पाण्डवोंके साथ सदा मिथ्या बर्ताव—छल-कपट ही किया है तो भी ये सदा तुम्हारा प्रिय करनेमें ही लगे रहे हैं। अतः तुम्हारे ये ईर्ष्या-द्वेष आदि दोष तुम्हारा ही अहित करनेवाले होंगे ।। ९ ।। त्वमुक्तः कुरुवृद्धेन मया च विदुरेण च । वासुदेवेन च तथा श्रेयो नैवाभिमन्यसे ।। १० ।। कुरुकुलके वृद्ध पुरुष भीष्मजीने, मैंने, विदुरजीने तथा भगवान् श्रीकृष्णने भी तुमसे तुम्हारे कल्याणकी ही बात बतायी है; तथापि तुम उसे मान नहीं रहे हो ।। १० ।। अस्ति मे बलमित्येव सहसा त्वं तितीर्षसि । सग्राहनक्रमकरं गङ्गावेगमिवोष्णगे ।। ११ ।। जैसे कोई अविवेकी मनुष्य वर्षाकालमें बढ़े हुए ग्राह और मकर आदि जलजन्तुओंसे युक्त गंगाजीके वेगको दोनों बाहुओंसे तैरना चाहता हो, उसी प्रकार तुम मेरे पास बल है, ऐसा समझकर पाण्डव-सेनाको सहसा लाँघ जानेकी इच्छा रखते हो ।। ११ ।। वास एव यथा त्यक्तं प्रावृण्वानोऽभिमन्यसे । स्रजं त्यक्तामिव प्राप्य लोभाद् यौधिष्ठिरीं श्रियम् ।। १२ ।। जैसे कोई दूसरेका छोड़ा हुआ वस्त्र पहन ले और उसे अपना मानने लगे, उसी प्रकार तुम त्यागी हुई मालाकी भाँति युधिष्ठिरकी राजलक्ष्मीको पाकर अब उसे लोभवश अपनी समझते हो ।। १२ ।। द्रौपदीसहितं पार्थं सायुधैर्भ्रातृभिर्वृतम् । वनस्थमपि राज्यस्थः पाण्डवं को विजेष्यति ।। १३ ।।

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