महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 907, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंछत्रं च ते महाश्वेतं भीमसेनो महाबलः ॥ २० ॥ अभिषिक्तस्य कौन्तेयो धारयिष्यति मूर्धनि । इसी प्रकार पाँचों भाई पुरुषसिंह पाण्डव, द्रौपदीके पाँचो पुत्र, पांचाल और चेदिदेशके नरेश तथा मैं—ये सब लोग तुम्हें पृथ्वीपालक सम्राट्के पदपर अभिषिक्त करेंगे। कठोर व्रतका पालन करनेवाले धर्मपुत्र धर्मात्मा कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर तुम्हारे युवराज होंगे, जो हाथमें श्वेत चँवर लेकर तुम्हारे पीछे रथपर बैठेंगे और महाबली कुन्तीकुमार भीमसेन राज्याभिषेक होनेके पश्चात् तुम्हारे मस्तकपर महान् श्वेत छत्र धारण करेंगे ॥
किङ्किणीशतनिर्घोषं वैयाघ्रपरिवारणम् ॥ २१ ॥ रथं श्वेतहयैर्युक्तमर्जुनो वाहयिष्यति । अभिमन्युश्च ते नित्यं प्रत्यासन्नो भविष्यति ॥ २२ ॥ सैकड़ों क्षुद्र घण्टिकाओंकी सुमधुर ध्वनिसे युक्त, व्याघ्रचर्मसे आच्छादित तथा श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए तुम्हारे रथको अर्जुन सारथि बनकर हाँकेंगे और अभिमन्यु सदा तुम्हारी सेवाके लिये निकट खड़ा रहेगा ॥ २१-२२ ॥
नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाश्च पञ्च ये । पञ्चालाश्चानुयास्यन्ति शिखण्डी च महारथः ॥ २३ ॥ नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँच पुत्र, पांचालदेशीय क्षत्रिय तथा महारथी शिखण्डी—ये सब तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे ॥ २३ ॥
अहं च त्वानुयास्यामि सर्वे चान्धकवृष्णयः । दाशार्हाः परिवारास्ते दाशार्णाश्च विशाम्पते ॥ २४ ॥ मैं तथा समस्त अन्धक और वृष्णिवंशके लोग भी तुम्हारा अनुसरण करेंगे। प्रजानाथ! दशार्ह तथा दशार्णकुलके समस्त क्षत्रिय तुम्हारे परिवार हो जायँगे ॥ २४ ॥
भुङ्क्ष्व राज्यं महाबाहो भ्रातृभिः सह पाण्डवैः । जपैर्होमैश्च संयुक्तो मङ्गलैश्च पृथग्विधैः ॥ २५ ॥ महाबाहो! तुम अपने भाई पाण्डवोंके साथ राज्य भोगो। जप, होम तथा नाना प्रकारके मांगलिक कर्मोंमें संलग्न रहो ॥ २५ ॥
पुरोगमाश्च ते सन्तु द्रविडाः सह कुन्तलैः । आन्ध्रास्तालचराश्चैव चूचुपा वेणुपास्तथा ॥ २६ ॥ द्रविड़, कुन्तल, आन्ध्र, तालचर, चूचुप तथा वेणुप देशके लोग तुम्हारे अग्रगामी सेवक हों ॥ २६ ॥
स्तुवन्तु त्वां च बहुभिः स्तुतिभिः सूतमागधाः । विजयं वसुषेणस्य घोषयन्तु च पाण्डवाः ॥ २७ ॥ सूत, मागध और वन्दीजन नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा तुम्हारा यशोगान करें और पाण्डवलोग महाराज वसुषेण कर्णकी विजय घोषित कर दें ॥ २७ ॥