महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 915, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुःशासनस्य रुधिरं यदा पास्यति पाण्डवः । आनर्दं नर्दतः सम्यक् तदा सुत्यं भविष्यति ॥ ४७ ॥ जब पाण्डुनन्दन भीमसेन सिंहनाद करते हुए दुःशासनका रक्त पान करेंगे, उस समय इस यज्ञका सुत्य (सोमाभिषव) कर्म पूरा होगा ॥ ४७ ॥
यदा द्रोणं च भीष्मं च पाञ्चाल्यौ पातयिष्यतः । तदा यज्ञावसानं तद् भविष्यति जनार्दन ॥ ४८ ॥ जनार्दन! जब दोनों पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न और शिखण्डी द्रोणाचार्य और भीष्मको मार गिरायेंगे, उस समय इस रणयज्ञका अवसान (बीच-बीचमें होनेवाला विराम) कार्य सम्पन्न होगा ॥ ४८ ॥
दुर्योधनं यदा हन्ता भीमसेनो महाबलः । तदा समाप्स्यते यज्ञो धार्तराष्ट्रस्य माधव ॥ ४९ ॥ माधव! जब महाबली भीमसेन दुर्योधनका वध करेंगे, उस समय धृतराष्ट्रपुत्रका प्रारम्भ किया हुआ यह यज्ञ समाप्त हो जायगा ॥ ४९ ॥
स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य सङ्गताः । हतेश्वरा नष्टपुत्रा हतनाथाश्च केशव ॥ ५० ॥ रुदत्यः सह गान्धार्या श्वगृध्रकुरराकुले । स यज्ञेऽस्मिन्नवभृथो भविष्यति जनार्दन ॥ ५१ ॥ केशव! जिनके पति, पुत्र और संरक्षक मार दिये गये होंगे, वे धृतराष्ट्रके पुत्रों और पौत्रोंकी बहुएँ जब गान्धारीके साथ एकत्र होकर कुत्तों, गीधों और कुरर पक्षियोंसे भरे हुए समरांगणमें रोती हुई विचरेंगी, जनार्दन! वही उस यज्ञका अवभृथस्नान होगा ॥
विद्यावृद्धा वयोवृद्धाः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ । वृथा मृत्युं न कुर्वीरंस्त्वत्कृते मधुसूदन ॥ ५२ ॥ क्षत्रियशिरोमणि मधुसूदन! तुम्हारे इस शान्ति-स्थापनके प्रयत्नसे कहीं ऐसा न हो कि विद्यावृद्ध और वयोवृद्ध क्षत्रियगण व्यर्थ मृत्युको प्राप्त हों (युद्धमें शस्त्रोंसे होनेवाली मृत्युसे वंचित रह जायें) ॥ ५२ ॥
शस्त्रेण निधनं गच्छेत् समृद्धं क्षत्रमण्डलम् । कुरुक्षेत्रे पुण्यतमे त्रैलोक्यस्यापि केशव ॥ ५३ ॥ केशव! कुरुक्षेत्र तीनों लोकोंके लिये परम पुण्यतम तीर्थ है। यह समृद्धिशाली क्षत्रियसमुदाय वहीं जाकर शस्त्रोंके आघातसे मृत्युको प्राप्त हो ॥ ५३ ॥
तदत्र पुण्डरीकाक्ष निधत्स्व यदभीप्सितम् । यथा कार्त्स्न्येन वार्ष्णेय क्षत्रं स्वर्गमवाप्नुयात् ॥ ५४ ॥ कमलनयन वृष्णिनन्दन! आप भी इसकी सिद्धिके लिये ही ऐसा मनोवांछित प्रयत्न करें, जिससे यह सारा-का-सारा क्षत्रियसम्मूह स्वर्गलोकमें पहुँच जाय ॥ ५४ ॥