महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 931, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘युद्धमें निश्चय ही मुझे बड़ा भारी दोष दिखायी देता है; परंतु युद्ध न होनेपर भी पाण्डवोंका पराभव स्पष्ट है। निर्धन होकर मृत्युको वरण कर लेना अच्छा है; परंतु बन्धु-बान्धवोंका विनाश करके विजय पाना कदापि अच्छा नहीं है ॥ १३ ॥ इति मे चिन्तयन्त्या वै हृदि दुःखं प्रवर्तते । पितामहः शान्तनव आचार्यश्च युधां पतिः ॥ १४ ॥ कर्णश्च धार्तराष्ट्रार्थं वर्धयन्ति भयं मम । ‘यह सब सोचकर मेरे हृदयमें बड़ा दुःख हो रहा है। शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, योद्धाओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण तथा कर्ण भी दुर्योधनके लिये ही युद्धभूमिमें उतरेंगे; अतः ये मेरे भयकी ही वृद्धि कर रहे हैं ॥ १४ १/२ ॥ नाचार्यः कामवान् शिष्यैर्द्रोणो युद्ध्येत जातुचित् ॥ १५ ॥ पाण्डवेषु कथं हार्दं कुर्यान्न च पितामहः । ‘आचार्य द्रोण तो सदा हमारे हितकी इच्छा रखनेवाले हैं। वे अपने शिष्योंके साथ कभी युद्ध नहीं कर सकते। इसी प्रकार पितामह भीष्म भी पाण्डवोंके प्रति हार्दिक स्नेह कैसे नहीं रखेंगे? ॥ १५ १/२ ॥ अयं त्वेको वृथादृष्टिर्धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ १६ ॥ मोहानुवर्ती सततं पापो द्वेष्टि च पाण्डवान् । ‘परंतु यह एकमात्र मिथ्यादर्शी कर्ण मोहवश सदा दुर्बुद्धि दुर्योधनका ही अनुसरण करनेवाला है। इसीलिये यह पापात्मा सर्वदा पाण्डवोंसे द्वेष ही रखता है ॥ १६ १/२ ॥ महत्यनर्थे निर्बन्धी बलवांश्च विशेषतः ॥ १७ ॥ कर्णः सदा पाण्डवानां तन्मे दहति सम्प्रति । आशंसे त्वद्य कर्णस्य मनोऽहं पाण्डवान् प्रति ॥ १८ ॥ प्रसादयितुमासाद्य दर्शयन्ती यथातथम् । ‘इसने सदा पाण्डवोंका बड़ा भारी अनर्थ करनेके लिये हठ ठान लिया है। साथ ही कर्ण अत्यन्त बलवान् भी है। यह बात इस समय मेरे हृदयको दग्ध किये देती है। अच्छा, आज मैं कर्णके मनको पाण्डवोंके प्रति प्रसन्न करनेके लिये उसके पास जाऊँगी और यथार्थ सम्बन्धका परिचय देती हुई उससे बातचीत करूँगी ॥ तोषिता भगवान् यत्र दुर्वासा मे वरं ददौ ॥ १९ ॥ आह्वानं मन्त्रसंयुक्तं वसन्त्याः पितृवेश्मनि । साहमन्तःपुरे राज्ञः कुन्तिभोजपुरस्कृता ॥ २० ॥ चिन्तयन्ती बहुविधं हृदयेन विदूयता । बलाबलं च मन्त्राणां ब्राह्मणस्य च वाग्बलम् ॥ २१ ॥ ‘जब मैं पिताके घर रहती थी, उन्हीं दिनों अपनी सेवाओंद्वारा मैंने भगवान् दुर्वासाको संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे यह वर दिया कि मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहन करनेपर मैं