महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा
वैशम्पायन उवाच
ततः सूर्यान्निश्चरितां कर्णः शुश्राव भारतीम्।
दुरत्ययां प्रणयिनीं पितृवद् भास्करेरिताम्॥ १॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर सूर्यमण्डलसे एक वाणी प्रकट हुई, जो सूर्यदेवकी ही कही हुई थी। उसमें पिताके समान स्नेह भरा हुआ था और वह दुर्लङ्घ्य प्रतीत होती थी। कर्णने उसे सुना॥ १॥
सत्यमाह पृथा वाक्यं कर्ण मातृवचः कुरु।
श्रेयस्ते स्यान्नरव्याघ्र सर्वमाचरतस्तथा॥ २॥
(वह वाणी इस प्रकार थी—) ‘नरश्रेष्ठ कर्ण! कुन्ती सत्य कहती है। तुम माताकी आज्ञाका पालन करो। उसका पूर्णरूपसे पालन करनेपर तुम्हारा कल्याण होगा’॥ २॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्य मात्रा च स्वयं पित्रा च भानुना।
चचाल नैव कर्णस्य मतिः सत्यधृतेस्तदा॥ ३॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! माता कुन्ती और पिता साक्षात् सूर्यदेवके ऐसा कहनेपर भी उस समय सच्चे धैर्यवाले कर्णकी बुद्धि विचलित नहीं हुई॥ ३॥
कर्ण उवाच
न चैतच्छ्रद्दधे वाक्यं क्षत्रिये भाषितं त्वया।
धर्मद्वारं ममैतत् स्यान्नियोगकरणं तव॥ ४॥
**कर्ण बोला—**राजपुत्रि! तुमने जो कुछ कहा है, उसपर मेरी श्रद्धा नहीं होती। तुम्हारी इस आज्ञाका पालन करना मेरे लिये धर्मका द्वार है, इसपर भी मैं विश्वास नहीं करता॥ ४॥
अकरोन्मयि यत् पापं भवती सुमहात्ययम्।
अपाकीर्णोऽस्मि यन्मातस्तद् यशः कीर्तिनाशनम्॥ ५॥
तुमने मेरे प्रति जो अत्याचार किया है, वह महान् कष्टदायक है। माता! तुमने जो मुझे पानीमें फेंक दिया, वह मेरे लिये यश और कीर्तिका नाशक बन गया॥ ५॥
अहं चेत् क्षत्रियो जातो न प्राप्तः क्षत्रसत्क्रियाम्।
त्वत्कृते किं नु पापीयः शत्रुः कुर्यान्ममाहितम्॥ ६॥