महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिये उनसे प्रार्थना की। भरतकुल-भूषण! महर्षिने कृपा की और उन स्त्रियोंसे तीन पुत्र उत्पन्न किये ।। ३६–३८ ।।
अन्धः करणहीनत्वान्न वै राजा पिता तव ।
राजा तु पाण्डुरभवन्महात्मा लोकविश्रुतः ।। ३९ ।।
तुम्हारे पिता अंधे थे, अतः नेत्रेन्द्रियसे हीन होनेके कारण राजा न हो सके, तब लोकविख्यात महामना पाण्डु इस देशके राजा हुए ।। ३९ ।।
स राजा तस्य ते पुत्राः पितुर्दायाद्यहारिणः ।
मा तात कलहं कार्षी राज्यस्यार्धं प्रदीयताम् ।। ४० ।।
पाण्डु राजा थे और उनके पुत्र पाण्डव पिताकी सम्पत्तिके उत्तराधिकारी हैं। अतः वत्स दुर्योधन! तुम कलह न करो। आधा राज्य पाण्डवोंको दे दो ।। ४० ।।
मयि जीवति राज्यं कः सम्प्रशासेत् पुमानिह ।
मावमंस्था वचो मह्यं शममिच्छामि वः सदा ।। ४१ ।।
मेरे जीते-जी मेरी इच्छाके विरुद्ध दूसरा कौन पुरुष यहाँ राज्य-शासन कर सकता है? ऐसा समझकर मेरे कथनकी अवहेलना न करो। मैं सदा तुमलोगोंमें शान्ति बनी रहनेकी शुभ कामना करता हूँ ।। ४१ ।।
न विशेषोऽस्ति मे पुत्र त्वयि तेषु च पार्थिव ।
मतमेतत् पितुस्तुभ्यं गान्धार्या विदुरस्य च ।। ४२ ।।
राजन्! मेरे लिये तुममें और पाण्डवोंमें कोई अन्तर नहीं है। तुम्हारे पिताका, गान्धारीका और विदुरका भी यही मत है ।। ४२ ।।
श्रोतव्यं खलु वृद्धानां नाभिशङ्कीर्वचो मम ।
नाशयिष्यसि मा सर्वमात्मानं पृथिवीं तथा ।। ४३ ।।
तुम्हें बड़े-बूढ़ोंकी बातें सुननी चाहिये। मेरी बातपर शंका न करो, नहीं तो तुम सबको, अपनेको और इस भूतलको भी नष्ट कर दोगे ।। ४३ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भगवद्वाक्ये
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भगवद्वाक्यसम्बन्धी एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४७ ।।