महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 955, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'वे बलवान्, उत्तम पराक्रमसे सम्पन्न एवं यादवोंके वंशप्रवर्तक हुए थे। उनकी बुद्धि बड़ी मन्द थी और उन्होंने घमंडमें आकर समस्त क्षत्रियोंका अपमान किया था॥ ७॥ न चातिष्ठत् पितुः शास्त्रे बलदर्पविमोहितः। अवमेने च पितरं भ्रातॄंश्चाप्यपराजितः॥ ८॥ 'बलके घमंडसे वे इतने मोहित हो रहे थे कि पिताके आदेशपर चलते ही नहीं थे। किसीसे पराजित न होनेवाले यदु अपने भाइयों और पिताका भी अपमान करते थे॥ ८॥ पृथिव्यां चतुरन्तायां यदुरेवाभवद् बली। वशे कृत्वा स नृपतीन् न्यवसन्नागसाह्वये॥ ९॥ 'चारों समुद्र जिसके अन्तमें हैं, उस भूमण्डलमें यदु ही सबसे अधिक बलवान् थे। वे समस्त राजाओंको वशमें करके हस्तिनापुरमें निवास करते थे॥ ९॥ तं पिता परमक्रुद्धो ययातिर्नहुषात्मजः। शशाप पुत्रं गान्धारे राज्याच्चापि व्यरोपयत्॥ १०॥ 'गान्धारीपुत्र! यदुके पिता नहुषनन्दन ययातिने अत्यन्त कुपित होकर यदुको शाप दे दिया और उन्हें राज्यसे भी उतार दिया॥ १०॥ ये चैनमन्ववर्तन्त भ्रातरो बलदर्पिताः। शशाप तानभिक्रुद्धो ययातिस्तनयानथ॥ ११॥ 'अपने बलका घमंड रखनेवाले जिन-जिन भाइयोंने यदुका अनुसरण किया, ययातिने कुपित होकर अपने उन पुत्रोंको भी शाप दे दिया॥ ११॥ यवीयांसं ततः पूरुं पुत्रं स्ववशवर्तिनम्। राज्ये निवेशयामास विधेयं नृपसत्तमः॥ १२॥ 'तदनन्तर अपने अधीन रहनेवाले आज्ञापालक छोटे पुत्र पूरुको नृपश्रेष्ठ ययातिने राज्यपर बिठाया॥ एवं ज्येष्ठोऽप्यथोत्सिक्तो न राज्यमभिजायते। यवीयांसोऽपि जायन्ते राज्यं वृद्धोपसेवया॥ १३॥ 'इस प्रकार यह सिद्ध है कि ज्येष्ठ पुत्र भी यदि अहंकारी हो तो उसे राज्यकी प्राप्ति नहीं होती और छोटे पुत्र भी वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करनेसे राज्य पानेके अधिकारी हो जाते हैं॥ १३॥ तथैव सर्वधर्मज्ञः पितुर्मम पितामहः। प्रतीपः पृथिवीपालस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ १४॥ 'इसी प्रकार मेरे पिताके पितामह राजा प्रतीप सब धर्मोंके ज्ञाता एवं तीनों लोकोंमें विख्यात थे॥ १४॥ तस्य पार्थिवसिंहस्य राज्यं धर्मेण शासतः। त्रयः प्रजज्ञिरे पुत्रा देवकल्पा यशस्विनः॥ १५॥