महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 96, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंहत्वा शत्रुं प्रहृष्टात्मा वासवः सह दैवतैः ॥ ४२ ॥ शत्रुको मारकर देवताओंसहित इन्द्रका हृदय हर्षसे भर गया। समस्त प्राणियोंने उन्हें नमस्कार किया और उन्होंने उन सबको सान्त्वना दी ॥ ४२ ॥ विष्णुं त्रिभुवनश्रेष्ठं पूजयामास धर्मवित् । ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयंकरे ॥ ४३ ॥ अनृतेनाभिभूतोऽभूच्छक्रः परमदुर्मनाः । त्रैशीर्ष्याभिभूतश्च स पूर्वं ब्रह्महत्यया ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् धर्मज्ञ देवराजने तीनों लोकोंके श्रेष्ठ आराध्यदेव भगवान् विष्णुका पूजन किया। इस प्रकार देवताओंको भय देनेवाले महापराक्रमी वृत्रासुरके मारे जानेपर विश्वासघातरूपी असत्यसे अभिभूत होकर इन्द्र मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गये। त्रिशिराके वधसे उत्पन्न हुई ब्रह्महत्याने तो उन्हें पहलेसे ही घेर रखा था ॥ ४३-४४ ॥ सोऽन्तमाश्रित्य लोकानां नष्टसंज्ञो विचेतनः । न प्राज्ञायत देवेन्द्रस्त्वभिभूतः स्वकल्मषैः ॥ ४५ ॥ वे सम्पूर्ण लोकोंकी अन्तिम सीमापर जाकर बेसुध और अचेत होकर रहने लगे। वहाँ अपने ही पापोंसे पीड़ित हुए देवेन्द्रका किसीको पता न चला ॥ ४५ ॥ प्रतिच्छन्नोऽवसच्चाप्सु चेष्टमान इवोरगः । ततः प्रणष्टे देवेन्द्रे ब्रह्महत्याभयार्दिते ॥ ४६ ॥ भूमिः प्रध्वस्तसंकाशा निर्वृक्षा शुष्ककानना । विच्छिन्नस्रोतसो नद्यः सरांस्यनुदकानि च ॥ ४७ ॥ वे जलमें विचरनेवाले सर्पकी भाँति पानीमें ही छिपकर रहने लगे। ब्रह्महत्याके भयसे पीड़ित होकर जब देवराज इन्द्र अदृश्य हो गये, तब यह पृथ्वी नष्ट-सी हो गयी। यहाँके वृक्ष उजड़ गये, जंगल सूख गये, नदियोंका स्रोत छिन्न-भिन्न हो गया और सरोवरोंका जल सूख गया ॥ ४६-४७ ॥ संक्षोभश्चापि सत्त्वानामनावृष्टिकृतोऽभवत् । देवाश्चापि भृशं त्रस्तास्तथा सर्वे महर्षयः ॥ ४८ ॥ सब जीवोंमें अनावृष्टिके कारण क्षोभ उत्पन्न हो गया। देवता तथा सम्पूर्ण महर्षि भी अत्यन्त भयभीत हो गये ॥ ४८ ॥ अराजकं जगत् सर्वमभिभूतमुपद्रवः । ततो भीताऽभवन् देवाः को नो राजा भवेदिति ॥ ४९ ॥ दिवि देवर्षयश्चापि देवराजविनाकृताः । न स्म कश्चन देवानां राज्ये वै कुरुते मतिम् ॥ ५० ॥ सम्पूर्ण जगत्में अराजकताके कारण भारी उपद्रव होने लगे। स्वर्गमें देवराज इन्द्रके न होनेसे देवता तथा देवर्षि भी भयभीत होकर सोचने लगे—'अब हमारा राजा कौन होगा?'