महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 961, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजानाथ! अब तुम्हें भी जो उचित जान पड़े, वह करो। भारत! कौरवसभामें भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी तथा धृतराष्ट्रने मेरे सामने जो बातें कही थीं, वे सब आपको सुना दीं। राजन्! यही वहाँका वृत्तान्त है॥ ६-७॥
साम्यमादौ प्रयुक्तं मे राजन् सौभ्रात्रमिच्छता। अभेदायास्य वंशस्य प्रजानां च विवृद्धये॥ ८॥ राजन्! मैंने सब भाइयोंमें उत्तम बन्धुजनोचित प्रेम बने रहनेकी इच्छासे पहले सामनीतिका प्रयोग किया था, जिससे इस वंशमें फूट न हो और प्रजाजनोंकी निरन्तर उन्नति होती रहे॥ ८॥
पुनर्भेदश्च मे युक्तो यदा साम न गृह्यते। कर्मानुकीर्तनं चैव देवमानुषसंहितम्॥ ९॥ जब वे सामनीति न ग्रहण कर सके, तब मैंने भेदनीतिका प्रयोग किया (उनमें फूट डालनेकी चेष्टा की)। पाण्डवोंके देव-मनुष्योचित कर्मोंका बारंबार वर्णन किया॥ ९॥
यदा नाद्रियते वाक्यं सामपूर्वं सुयोधनः। तदा मया समानीय भेदिताः सर्वपार्थिवाः॥ १०॥ जब मैंने देखा दुर्योधन मेरे सान्त्वनापूर्ण वचनोंका पालन नहीं कर रहा है, तब मैंने सब राजाओंको बुलाकर उनमें फूट डालनेका प्रयत्न किया॥ १०॥
अद्भुतानि च घोराणि दारुणानि च भारत। अमानुषाणि कर्माणि दर्शितानि मया विभो॥ ११॥ भारत! वहाँ मैंने बहुत-से अद्भुत, भयंकर, निष्ठुर एवं अमानुषिक कर्मोंका प्रदर्शन किया॥ ११॥
निर्भर्त्स्यित्वा राज्ञस्तांस्तृणीकृत्य सुयोधनम्। राधेयं भीषयित्वा च सौबलं च पुनः पुनः॥ १२॥ द्यूततो धार्तराष्ट्राणां निन्दां कृत्वा तथा पुनः। भेदयित्वा नृपान् सर्वान् वाग्भिर्मन्त्रेण चासकृत्॥ १३॥ पुनः सामाभिसंयुक्तं सम्प्रदानमथाब्रुवम्। अभेदात् कुरुवंशस्य कार्ययोगात् तथैव च॥ १४॥ समस्त राजाओंको डाँट बताकर दुर्योधनको तिनकेके समान समझकर तथा राधानन्दन कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिको बार-बार डराकर जूएसे धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करके वाणी तथा गुप्त मन्त्रणाद्वारा सब राजाओंके मनमें अनेक बार भेद उत्पन्न करनेके पश्चात् फिर सामसहित दानकी बात उठायी, जिससे कुरुवंशकी एकता बनी रहे और अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो जाय॥ १२—१४॥
ते शूरा धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य विदुरस्य च। तिष्ठेयुः पाण्डवाः सर्वे हित्वा मानमधश्वराः॥ १५॥