महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 969, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतो यत्नो महांस्तत्र शमः स्यादिति भारत । धर्मस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम् ॥ ४३ ॥ ‘महाबाहु भरतनन्दन! मैंने भी महान् युद्धकी सम्भावना देखकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये शान्ति-स्थापनके निमित्त महान् प्रयत्न किया था। इससे हमलोग धर्मके ऋणसे भी उऋण हो गये हैं। दूसरोंके दोष बतानेवाले लोग भी अब हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं कर सकते ॥ ४२-४३ ॥
कृतास्त्रं मन्यते बाल आत्मानमविचक्षणः । धार्तराष्ट्रो बलस्थं च पश्यत्यात्मानमातुरः ॥ ४४ ॥ ‘धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन युद्धके लिये आतुर हो रहा है। वह मूर्ख और अयोग्य होकर भी अपनेको अस्त्रविद्यामें पारंगत मानता है और दुर्बल होकर भी अपनेको बलवान् समझता है ॥ ४४ ॥
युज्यतां वाहिनी साधु वधसाध्या हि मे मताः । न धार्तराष्ट्राः शक्ष्यन्ति स्थातुं दृष्ट्वा धनंजयम् ॥ ४५ ॥ भीमसेनं च संक्रुद्धं यमौ चापि यमोपमौ । युयुधानद्वितीयं च धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥ ४६ ॥ अभिमन्युं द्रौपदेयान् विराटद्रुपदावपि । अक्षौहिणीपतींश्चान्यान् नरेन्द्रान् भीमविक्रमान् ॥ ४७ ॥ ‘अतः आप अपनी सेनाको युद्धके लिये अच्छी तरहसे सुसज्जित कीजिये; क्योंकि मेरे मतमें वे शत्रुवधसे ही वशीभूत हो सकते हैं। वीर अर्जुन, क्रोधमें भरे हुए भीमसेन, यमराजके समान नकुल-सहदेव, सात्यकिसहित अमर्षशील धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, विराट, द्रुपद तथा अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति अन्यान्य भयंकर पराक्रमी नरेशोंको युद्धके लिये उद्यत देखकर धृतराष्ट्रके पुत्र रणभूमिमें टिक नहीं सकेंगे ॥ ४५—४७ ॥
सारवद् बलमस्माकं दुष्प्रधर्षं दुरासदम् । धार्तराष्ट्रबलं संख्ये हनिष्यति न संशयः ॥ ४८ ॥ धृष्टद्युम्नमहं मन्ये सेनापतिमरिंदम । ‘हमारी सेना अत्यन्त शक्तिशाली, दुर्धर्ष और दुर्गम है। वह युद्धमें धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाका संहार कर डालेगी, इसमें संशय नहीं है। शत्रुदमन! मैं धृष्टद्युम्नको ही प्रधान सेनापति होनेयोग्य मानता हूँ’ ॥ ४८ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते तु कृष्णेन सम्प्राहृष्यन्नरोत्तमाः ॥ ४९ ॥ तेषां प्रहृष्टमनसां नादः समभवन्महान् ।