महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 975, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिर्यः शिविरस्यासीत् पाण्डवानां महात्मनाम् । तद्विधानि नरेन्द्राणां कारयामास केशवः ॥ ९ ॥ भरतनन्दन जनमेजय! कुरुक्षेत्रमें हिरण्वती नामक एक पवित्र नदी है, जो स्वच्छ एवं विशुद्ध जलसे भरी है। उसके तटपर अनेक सुन्दर घाट हैं। उस नदीमें कंकड़, पत्थर और कीचड़का नाम नहीं है। उसके समीप पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने खाईं खुदवायी और उसकी रक्षाके लिये पहरेदारोंको नियुक्त करके वहीं सेनाको ठहराया। महात्मा पाण्डवोंके लिये शिविरका निर्माण जिस विधिसे किया गया था, उसी प्रकारके भगवान् केशवने अन्य राजाओंके लिये शिविर बनवाये ॥ ७—९ ॥ प्रभूततरकाष्ठानि दुराधर्षतराणि च । भक्ष्यभोज्यान्नपानानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १० ॥ शिविराणि महार्हाणि राज्ञां तत्र पृथक् पृथक् । विमानानीव राजेन्द्र निविष्टानि महीतले ॥ ११ ॥ राजेन्द्र! उस समय राजाओंके लिये सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दुर्धर्ष एवं बहुमूल्य शिविर पृथक्-पृथक् बनवाये गये थे। उनके भीतर बहुत-से काष्ठों तथा प्रचुर मात्रामें भक्ष्य-भोज्य अन्न एवं पान-सामग्रीका संग्रह किया गया था। वे समस्त शिविर भूतलपर रहते हुए विमानोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १०-११ ॥ तत्रासन् शिल्पिनः प्राज्ञाः शतशो दत्तवेतनाः । सर्वोपकरणैर्युक्ता वैद्याः शास्त्रविशारदाः ॥ १२ ॥ वहाँ सैकड़ों विद्वान् शिल्पी और शास्त्रविशारद वैद्य वेतन देकर रखे गये थे, जो समस्त आवश्यक उपकरणोंके साथ वहाँ रहते थे ॥ १२ ॥ ज्याधनुर्वर्मशस्त्राणां तथैव मधुसर्पिषोः । ससर्जरेसपांसूनां राशयः पर्वतोपमाः ॥ १३ ॥ प्रत्येक शिविरमें प्रत्यंचा, धनुष, कवच, अस्त्र-शस्त्र, मधु, घी तथा रालका चूरा—इन सबके पहाड़ों-जैसे ढेर लगे हुए थे ॥ १३ ॥ बहूदकं सुयवसं तुषाङ्गारसमन्वितम् । शिबिरे शिबिरे राजा संचकार युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥ राजा युधिष्ठिरने प्रत्येक शिविरमें प्रचुर जल, सुन्दर घास, भूसी और अग्निका संग्रह करा रखा था ॥ १४ ॥ महायन्त्राणि नाराचास्तोমরাणि परश्वधाः । धनूंषि कवचादीनि ऋष्टयस्तूणसंयुताः ॥ १५ ॥ बड़े-बड़े यन्त्र, नाराच, तोमर, फरसे, धनुष, कवच, ऋष्टि और तरकस—ये सब वस्तुएँ भी उन सभी शिविरोंमें संगृहीत थीं ॥ १५ ॥ गजाः कण्टकसंनाहा लोहवर्मोत्तरच्छदाः ।