भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 984, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 984

पार्थिवेषु न सर्वेषु य इमे तव सैनिकाः । यत् पापं यन्नकल्याणं सर्वं तस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥ १४ ॥ इन सब राजाओंमें, जो आपकी सेनामें स्थित हैं, जो पाप और अमंगलकारक भाव नहीं है, वह सब अकेले दुर्योधनमें विद्यमान है ॥ १४ ॥

न चापि वयमत्यर्थं परित्यागेन कर्हिचित् । कौरवैः शममिच्छामस्तत्र युद्धमनन्तरम् ॥ १५ ॥ हमलोग भी बहुत अधिक त्याग करके (सर्वस्व खोकर) कभी किसी भी दशामें कौरवोंके साथ संधिकी इच्छा नहीं रखते हैं। अतः इसके बाद हमारे लिये युद्ध ही करना उचित है ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा पार्थिवाः सर्वे वासुदेवस्य भाषितम् । अब्रुवन्तो मुखं राज्ञः समुदैक्षन्त भारत ॥ १६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन! भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर सब राजा कुछ न बोलते हुए केवल महाराज युधिष्ठिरके मुँहकी ओर देखने लगे ॥ १६ ॥

युधिष्ठिरस्त्वभिप्रायमभिलक्ष्य महीक्षिताम् । योगमाज्ञापयामास भीमार्जुनयमैः सह ॥ १७ ॥ युधिष्ठिरने राजाओंका अभिप्राय समझकर भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेवके साथ उन्हें युद्धके लिये तैयार हो जानेकी आज्ञा दे दी ॥ १७ ॥

ततः किलकिलाभूतमनीकं पाण्डवस्य ह । आज्ञापिते तदा योगे समहृष्यन्त सैनिकाः ॥ १८ ॥ उस समय युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा मिलते ही समस्त योद्धा हर्षसे खिल उठे, फिर तो पाण्डवोंके सैनिक किलकारियाँ करने लगे ॥ १८ ॥

अवध्यानां वधं पश्यन् धर्मराजो युधिष्ठिरः । निःश्वसन् भीमसेनं च विजयं चेदमब्रवीत् ॥ १९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर यह देखकर कि युद्ध छिड़नेपर अवध्य पुरुषोंका भी वध करना पड़ेगा, खेदसे लंबी साँसें खींचते हुए भीमसेन और अर्जुनसे इस प्रकार बोले ॥

यदर्थं वनवासश्च प्राप्तं दुःखं च यन्मया । सोऽयमस्मानुपैत्येव परोऽनर्थः प्रयत्नतः ॥ २० ॥ ‘जिससे बचनेके लिये मैंने वनवासका कष्ट स्वीकार किया और नाना प्रकारके दुःख सहन किये, वही महान् अनर्थ मेरे प्रयत्नसे भी टल न सका। वह हमलोगोंपर आना ही चाहता है ॥ २० ॥

तस्मिन् यत्नः कृतोऽस्माभिः स नो हीनः प्रयत्नतः ।

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