भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 995

उनके पक्षके दस हजार योद्धाओंका वध करता रहूँगा, मैं इस प्रकार इनकी सेनाका संहार करूँगा ।। २१-२२ ।। सेनापतिस्त्वहं राजन् समये नापरेण ते । भविष्यामि यथाकामं तन्मे श्रोतुमिहार्हसि ।। २३ ।। राजन्! मैं अपनी इच्छाके अनुसार एक शर्तपर तुम्हारा सेनापति होऊँगा। उसके बदले दूसरी शर्त नहीं मानूँगा। उस शर्तको तुम मुझसे यहाँ सुन लो ।। २३ ।। कर्णो वा युध्यतां पूर्वमहं वा पृथिवीपते । स्पर्धते हि सदात्यर्थं सूतपुत्रो मया रणे ।। २४ ।। पृथिवीपते! या तो पहले कर्ण ही युद्ध कर ले या मैं ही युद्ध करूँ; क्योंकि यह सूतपुत्र सदा युद्धमें मुझसे अत्यन्त स्पर्धा रखता है ।। २४ ।।

कर्ण उवाच

नाहं जीवति गाङ्गेये राजन् योत्स्ये कथंचन । हते भीष्मे तु योत्स्यामि सह गाण्डीवधन्वना ।। २५ ।। **कर्ण बोला—**राजन्! मैं गंगानन्दन भीष्मके जीते-जी किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। इनके मारे जानेपर ही गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ लडूंगा ।। २५ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततः सेनापतिं चक्रे विधिवद् भूरिदक्षिणम् । धृतराष्ट्रात्मजो भीष्मं सोऽभिषिक्तो व्यरोचत ।। २६ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर विधिपूर्वक अभिषेक किया। अभिषेक हो जानेपर उनकी बड़ी शोभा हुई ।। २६ ।।