भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1007

सिंहनादोद्धतरवे गम्भीरे सैन्यसागरे ॥ २७ ॥ स्वैः परैश्च समेतेभ्यः सात्वतेन च संगमे । एकस्यैकेन हि कथं संग्रामः सम्भविष्यति ॥ २८ ॥ तुम स्वयं कवच हिलाते हुए रथपर चढ़े थे, धनुषकी प्रत्यंचा खींचते थे और अपने बहुसंख्यक शत्रुओंके साथ युद्ध कर रहे थे। इस प्रकार रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदलोंसे भरे हुए सिंहनादकी भैरव गर्जनासे व्याप्त गम्भीर सैन्य-समुद्रमें जहाँ अपने और शत्रुपक्षके एकत्र हुए लोगोंका परस्पर युद्ध चल रहा था, तुम्हारी सात्यकिके साथ मुठभेड़ हुई थी। ऐसे तुमुल युद्धमें किसी भी एक योद्धाका एक ही योद्धाके साथ संग्राम कैसे माना जा सकता है? ॥ २६—२८ ॥ बहुभिः सह संगम्य निर्जित्य च महारथान् । श्रान्तश्च श्रान्तवाहश्च विमनाः शस्त्रपीडितः ॥ २९ ॥ सात्यकि बहुत-से योद्धाओंके साथ युद्ध करके कितने ही महारथियोंको पराजित करनेके बाद थक गया था। उसके घोड़े भी परिश्रमसे चूर-चूर हो रहे थे और वह अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित हो खिन्नचित्त हो गया था ॥ २९ ॥ ईदृशं सात्यकिं संख्ये निर्जित्य च महारथम् । अधिकत्वं विजानीषे स्ववीर्यवशमागतम् ॥ ३० ॥ ऐसी अवस्थामें महारथी सात्यकिको युद्धमें जीतकर तुम यह समझने लगे कि मैं सात्यकिसे बड़ा वीर हूँ और वह मेरे पराक्रमसे वशमें आ गया है ॥ ३० ॥ यदिच्छसि शिरश्चास्य असिना हन्तुमाहवे । तथा कृच्छ्रगतं चैव सात्यकिं कः क्षमिष्यति ॥ ३१ ॥ इसलिये तुम युद्धस्थलमें तलवारसे उसका सिर काट लेना चाहते थे। सात्यकिको वैसे संकटमें देखकर मेरे पक्षका कौन वीर सहन करेगा? ॥ ३१ ॥ त्वं वै विगर्ह्यात्मानमात्मानं यो न रक्षसि । कथं करिष्यसे वीर यो वा त्वां संश्रयेज्जनः ॥ ३२ ॥ तुम अपनी ही निन्दा करो, जो कि अपनी भी रक्षातक नहीं कर सकते। वीरवर! फिर जो तुम्हारे आश्रयमें होगा, उसकी रक्षा कैसे कर सकोगे? ॥ ३२ ॥

संजय उवाच

एवमुक्तो महाबाहूर्यूपकेतुर्महायशाः । युयुधानं समुत्सृज्य रणे प्रायमुपाविशत् ॥ ३३ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! अर्जुनके ऐसा कहनेपर यूपके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले महायशस्वी महाबाहु भूरिश्रवा सात्यकिको छोड़कर रणभूमिमें आमरण अनशनका नियम लेकर बैठ गये ॥ ३३ ॥