भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1014

कुन्तीकुमार अर्जुनने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए जो मुझे संकटमें देखकर

भूरिश्रवाकी तलवारसहित बाँह काट डाली, इसीसे मैं भूरिश्रवाको मारनेके यशसे वंचित रह

गया ।। ६५ ।।

भवितव्यं हि यद् भावि दैवं चेष्टयतीव च ।

सोऽयं हतो विमर्देऽस्मिन् किमत्राधर्मचेष्टितम् ।। ६६ ।।

जो होनहार होती है, उसके अनुकूल ही दैव चेष्टा कराता है। इसीके अनुसार इस

संग्राममें भूरिश्रवा मारे गये हैं। इसमें अधर्मपूर्ण चेष्टा क्या है? ।। ६६ ।।

अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि ।

न हन्तव्याः स्त्रिय इति यद् ब्रवीषि प्लवङ्गम ।। ६७ ।।

सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा ।

पीडाकरममित्राणां यत् स्यात् कर्तव्यमेव तत् ।। ६८ ।।

महर्षि वाल्मीकिने पूर्वकालमें ही इस भूतलपर एक श्लोकका गान किया है। जिसका

भावार्थ इस प्रकार है—‘वानर! तुम जो यह कहते हो कि स्त्रियोंका वध नहीं करना चाहिये,

उसके उत्तरमें मेरा यह कहना है कि उद्योगी मनुष्यके लिये सदा सब समय वह कार्य करने

ही योग्य माना गया है, जो शत्रुओंको पीड़ा देनेवाला हो' ।। ६७-६८ ।।

संजय उवाच

एवमुक्ते महाराज सर्वे कौरवपुङ्गवाः ।

न स्म किंचिद्भाषन्त मनसा समपूजयन् ।। ६९ ।।

संजय कहते हैं—महाराज! सात्यकिके ऐसा कहनेपर समस्त श्रेष्ठ कौरवोंने उसके

उत्तरमें कुछ नहीं कहा। वे मन-ही-मन उनकी प्रशंसा करने लगे ।। ६९ ।।

मन्त्राभिपूतस्य महाध्वरेषु

यशस्विनो भूरिसहस्रदस्य च ।

मुनेरिवारण्यगतस्य तस्य

न तत्र कश्चिद् वधमभ्यनन्दत ।। ७० ।।

बड़े-बड़े यज्ञोंमें मन्त्रयुक्त अभिषेकसे जो पवित्र हो चुके थे, यज्ञोंमें कई हजार

स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणा देते थे, जिनका यश सर्वत्र फैला हुआ था और जो वनवासी मुनिके

समान वहाँ बैठे हुए थे, उन भूरिश्रवाके वधका किसीने भी अभिनन्दन नहीं किया ।। ७० ।।

सुनीलकेशं वरदस्य तस्य

शूरस्य पारावतलोहिताक्षम् ।

अश्वस्य मेध्यस्य शिरो निकृत्तं

न्यस्तं हविर्धानमिवान्तरेण ।। ७१ ।।