महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंययातिसे देवयानीके गर्भसे जो ज्येष्ठ पुत्र हुआ, उसका नाम यदु था। इन्हीं यदुके वंशमें देवमीढ नामसे विख्यात एक यादव हो गये हैं। उनके पुत्रका नाम था शूर, जो तीनों लोकोंमें सम्मानित थे। शूरके पुत्र नरश्रेष्ठ शौरि हुए, जो महायशस्वी वसुदेवके नामसे प्रसिद्ध हैं ।। ६-७ ।। धनुष्यनवरः शूरः कार्तवीर्यसमो युधि । तद्वीर्यश्चापि तत्रैव कुले शिनिरभून्नृप ।। ८ ।। शूर धनुर्विद्यामें सबसे श्रेष्ठ थे। वे युद्धमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी थे। नरेश्वर! जिस कुलमें शूरका जन्म हुआ था, उसीमें उन्हींके समान बलशाली शिनि हुए ।। ८ ।। एतस्मिन्नेव काले तु देवकस्य महात्मनः । दुहितुः स्वयंवरे राजन् सर्वक्षत्रसमागमे ।। ९ ।। राजन्! इसी समय महात्मा देवककी पुत्री देवकीके स्वयंवरमें सम्पूर्ण क्षत्रिय एकत्र हुए थे ।। ९ ।। तत्र वै देवकीं देवीं वसुदेवार्थमाशु वै । निर्जित्य पार्थिवान् सर्वान् रथमारोपयच्छिनिः ।। १० ।। उस स्वयंवरमें शिनिने शीघ्र ही समस्त राजाओंको जीतकर वसुदेवके लिये देवकी देवीको रथपर बैठा लिया ।। १० ।। तां दृष्ट्वा देवकीं शूरो रथस्थां पुरुषर्षभ । नामृष्यत महातेजाः सोमदत्तः शिनेर्नृप ।। ११ ।। नरश्रेष्ठ! नरेश्वर! उस समय महातेजस्वी शूरवीर सोमदत्तने देवकी देवीको रथपर बैठे हुए देख शिनिके पराक्रमको सहन नहीं किया ।। ११ ।। तयोर्युद्धमभूद् राजन् दिनार्धं चित्रमद्भुतम् । बाहुयुद्धं सुबलिनोः प्रसक्तं पुरुषर्षभ ।। १२ ।। पुरुषप्रवर महाराज! उन दोनों महाबली शिनि और सोमदत्तमें आधे दिनतक विचित्र एवं अद्भुत बाहुयुद्ध हुआ ।। शिनिना सोमदत्तस्तु प्रसह्य भुवि पातितः । असिमुद्यम्य केशेषु प्रगृह्य च पदा हतः ।। १३ ।। उसमें शिनिने सोमदत्तको बलपूर्वक पृथ्वीपर पटक दिया और तलवार उठाकर उनकी चुटिया पकड़ ली एवं उन्हें लात मारी ।। १३ ।। मध्ये राजसहस्राणां प्रेक्षकाणां समन्ततः । कृपया च पुनस्तेन स जीवेति विसर्जितः ।। १४ ।। चारों ओरसे सहस्रों नरेश दर्शक बनकर यह युद्ध देख रहे थे। उनके बीचमें पुनः कृपा करके 'जाओ, जीवित रहो' ऐसा कहकर शिनिने सोमदत्तको छोड़ दिया ।। तदवस्थः कृतस्तेन सोमदत्तोऽथ मारिष ।