भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1019, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1019

एतत् ते कथितं राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २० ॥
इतना ही नहीं, उसने सारी सेनाओंके देखते-देखते सात्यकिको लात भी मारी। राजन्! आप मुझसे जो पूछ रहे थे, उसके उत्तरमें यह प्रसंग सुनाया है ॥ २० ॥
न हि शक्यो रणे जेतुं सात्वतो मनुजर्षभैः ।
लब्धलक्ष्याश्च संग्रामे बहुशश्चित्रयोधिनः ॥ २१ ॥
सात्यकिको रणभूमिमें श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ मनुष्य भी नहीं जीत सकते। वृष्णिवंशी योद्धा अपने निशानेको सफलतापूर्वक वेध लेते हैं। वे संग्रामभूमिमें अनेक प्रकारसे विचित्र युद्ध करनेवाले होते हैं ॥ २१ ॥
देवदानवगन्धर्वान् विजेतारो ह्यविस्मिताः ।
स्ववीर्यविजये युक्ता नैते परपरिग्रहाः ॥ २२ ॥
देवताओं, दानवों तथा गन्धर्वोंपर भी वे विजयी होते हैं। फिर भी इसके लिये उनके मनमें गर्व या विस्मय नहीं होता। वे अपने ही बलसे विजय पानेका उद्योग करते हैं। ये वृष्णिवंशी कभी पराधीन नहीं होते हैं ॥ २२ ॥
न तुल्यं वृष्णिभिरिह दृश्यते किंचन प्रभो ।
भूतं भव्यं भविष्यच्च बलेन भरतर्षभ ॥ २३ ॥
शक्तिशाली भरतश्रेष्ठ! भूत, वर्तमान और भविष्य कोई भी जगत् बलमें वृष्णिवंशियोंके समान नहीं दिखायी देता ॥ २३ ॥
न ज्ञातिमवमन्यन्ते वृद्धानां शासने रताः ।
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ॥ २४ ॥
जेतारो वृष्णिवीराणां किं पुनर्मानवा रणे ।
ये अपने कुटुम्बीजनोंकी अवहेलना नहीं करते हैं। सदा बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञामें तत्पर रहते हैं। देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग और राक्षस भी युद्धमें वृष्णिवीरोंपर विजय नहीं पा सकते; फिर मनुष्य किस गिनतीमें हैं? ॥
ब्रह्मद्रव्ये गुरुद्रव्ये ज्ञातिस्वे चाप्यहिंसकाः ॥ २५ ॥
एतेषां रक्षितारश्च ये स्युः कस्याञ्चिदापदि ।
अर्थवन्तो न चोत्सिक्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ २६ ॥
ये ब्राह्मण, गुरु तथा कुटुम्बीजनोंके धन लेनेके लिये कभी हिंसा नहीं करते हैं। इन ब्राह्मण-गुरु आदिमें जो कोई भी किसी आपत्तिमें पड़े हों, उनकी ये वृष्णिवंशी रक्षा करते हैं। ये सब-के-सब धनवान्, अभिमानशून्य, ब्राह्मण-भक्त और सत्यवादी होते हैं ॥
समर्थान् नावमन्यन्ते दीनानभ्युद्धरन्ति च ।
नित्यं देवपरा दान्तास्त्रातारश्चाविकत्थनाः ॥ २७ ॥
ये सामर्थ्यशाली पुरुषोंकी अवहेलना नहीं करते और दीन-दुःखियोंका उद्धार करते हैं। सदा देवभक्त, जितेन्द्रिय, दूसरोंके संरक्षक तथा आत्मप्रशंसासे दूर रहनेवाले हैं ॥ २७ ॥

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