महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘कुरुश्रेष्ठ! वैसा अवसर आनेपर तुम्हें अवश्य उसके ऊपर प्रहार करना चाहिये। इस बातपर ध्यान नहीं देना चाहिये कि सूर्यदेव अस्त हो गये’ ।। ६६ ।।
एवमस्त्विति बीभत्सुः केशवं प्रत्यभाषत ।
ततोऽसृजत् तमः कृष्णः सूर्यस्यावरणं प्रति ।। ६७ ।।
योगी योगेन संयुक्तो योगिनामीश्वरो हरिः ।
यह सुनकर अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘प्रभो! ऐसा ही हो।’ तब योगी, योगयुक्त और योगीश्वर भगवान् श्रीकृष्णने सूर्यको छिपानेके लिये अन्धकारकी सृष्टि की ।। ६७ १/२ ।।
सृष्टे तमसि कृष्णेन गतोऽस्तमिति भास्करः ।। ६८ ।।
त्वदीया जहृषुर्योधाः पार्थनाशान्नराधिप ।
नरेश्वर! श्रीकृष्णद्वारा अन्धकारकी सृष्टि होनेपर सूर्यदेव अस्त हो गये, ऐसा मानते हुए आपके योद्धा अर्जुनका विनाश निकट देख हर्षमग्न हो गये ।। ६८ १/२ ।।
ते प्रहृष्टा रणे राजन् नापश्यन् सैनिका रविम् ।। ६९ ।।
उन्नाम्य वक्त्राणि तदा स च राजा जयद्रथः ।
राजन्! उस रणक्षेत्रमें हर्षमग्न हुए आपके सैनिकोंने सूर्यकी ओर देखातक नहीं। केवल राजा जयद्रथ उस समय बारंबार मुँह ऊँचा करके सूर्यकी अरि देख रहा था ।। ६९ १/२ ।।
वीक्षमाणे ततस्तस्मिन् सिन्धुराजे दिवाकरम् ।। ७० ।।
पुनरेवाब्रवीत् कृष्णो धनंजयमिदं वचः ।
जब इस प्रकार सिंधुराज दिवाकरकी ओर देखने लगा, तब भगवान् श्रीकृष्ण पुनः अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ।। ७० १/२ ।।
पश्य सिन्धुपतिं वीरं प्रेक्षमाणं दिवाकरम् ।। ७१ ।।
भयं हि विप्रमुच्यैतत् त्वत्तो भरतसत्तम ।
‘भरतश्रेष्ठ! देखो, यह वीर सिंधुराज अब तुम्हारा भय छोड़कर सूर्यदेवकी ओर दृष्टिपात कर रहा है ।।
अयं कालो महाबाहो वधायास्य दुरात्मनः ।। ७२ ।।
छिन्धि मूर्धानमस्याशु कुरु साफल्यमात्मनः ।
‘महाबाहो! इस दुरात्माके वधका यही अवसर है। तुम शीघ्र इसका मस्तक काट डालो और अपनी प्रतिज्ञा सफल करो’ ।। ७२ १/२ ।।
इत्येवं केशवेनोक्तः पाण्डुपुत्रः प्रतापवान् ।। ७३ ।।
न्यवधीत् तावकं सैन्यं शरैरर्काग्निसंनिभैः ।
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर प्रतापी पाण्डुपुत्र अर्जुनने सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा आपकी सेनाका वध आरम्भ किया ।। ७३ १/२ ।।