महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1054, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस महान् शंखनादको सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरको यह निश्चय हो गया कि महात्मा अर्जुनने सिंधुराज जयद्रथको मार डाला ।। १३८ ।। ततो वादित्रघोषेण स्वान् योधन् पर्यहर्षयत् । अभ्यवर्तत संग्रामे भारद्वाजं युयुत्सया ॥ १३९ ॥ तदनन्तर युधिष्ठिर भी विजयके बाजे बजवाकर अपने योद्धाओंका हर्ष बढ़ाने लगे। वे युद्धकी इच्छासे संग्रामभूमिमें द्रोणाचार्यके सामने डटे रहे ।। १३९ ।। ततः प्रवृत्ते राजन्नस्तंगच्छति भास्करे । द्रोणस्य सोमकैः सार्धं संग्रामो लोमहर्षणः ॥ १४० ॥ राजन्! तदनन्तर सूर्यास्त होते समय द्रोणाचार्यका सोमकोंके साथ रोमांचकारी संग्राम छिड़ गया ।। १४० ।। ते तु सर्वे प्रयत्नेन भारद्वाजं जिघांसवः । सैन्धवे निहते राजन्नयुध्यन्त महारथाः ॥ १४१ ॥ नरेश्वर! सिंधुराजके मारे जानेपर समस्त सोमक महारथी द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे प्रयत्नपूर्वक युद्ध करने लगे ।। १४१ ।। पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा सैन्धवं विनिहत्य च । अयोधयंस्तु ते द्रोणं जयोन्मत्तास्ततस्ततः ॥ १४२ ॥ पाण्डव सिंधुराजको मारकर विजय पा चुके थे। अतः वे विजयोल्लाससे उन्मत्त हो जहाँ-तहाँसे आकर द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करने लगे ।। १४२ ।। अर्जुनोऽपि ततो योधांस्तावकान् रथसत्तमान् । अयोधयन्महाबाहुर्हत्वा सैन्धवकं नृपम् ॥ १४३ ॥ महाबाहु अर्जुनने भी सिंधुराजको मारकर आपके श्रेष्ठ रथी योद्धाओंके साथ युद्ध छेड़ दिया ।। १४३ ।। स देवशत्रूनिव देवराजः किरीटमाली व्यधमत् समन्तात् । यथा तमांस्यभ्युदितस्तमोघ्नः पूर्वप्रतिज्ञां समवाप्य वीरः ॥ १४४ ॥ जैसे देवराज इन्द्र देवशत्रुओंका संहार करते हैं तथा जैसे तिमिरारि सूर्य उदित होकर अन्धकारका विनाश कर डालते हैं, उसी प्रकार किरीटधारी वीर अर्जुनने अपनी पहली प्रतिज्ञा पूरी करके सब ओरसे आपकी सेनाका संहार आरम्भ कर दिया ।। १४४ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि जयद्रथवधे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४६ ॥