महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1073, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैकान्तसिद्धिः संग्रामे वासवस्यापि विद्यते ॥) ‘राधापुत्र! मैं इस युद्धके मुहानेपर सम्पूर्ण शस्त्रधारी योद्धाओंके बीचमें तुझसे कहे देता हूँ, तू अपने सारे कार्य सब प्रकारसे पूर्ण कर ले। संग्राममें इन्द्रको भी एकान्ततः सिद्धि नहीं प्राप्त होती।
मुमूर्षुयुर्युधानेन विरथो विकलेन्द्रियः । मद्वध्यस्त्वमिति ज्ञात्वा जित्वा जीवन् विसर्जितः ॥ १० ॥ ‘सात्यकिने तुझे रथहीन करके मृत्युके निकट पहुँचा दिया था। तेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी थीं, तो भी ‘तू मेरा वध्य है’ यह जानकर उन्होंने तुझे जीतकर भी जीवित छोड़ दिया ॥ १० ॥
यदृच्छया रणे भीमं युध्यमानं महाबलम् । कथंचिद् विरथं कृत्वा यत् त्वं रूक्षमभाषथाः ॥ ११ ॥ अधर्मस्त्वेष सुमहाननार्यचरितं च तत् । ‘परंतु तूने रणभूमिमें युद्धपरायण महाबली भीमसेनको दैवेच्छासे किसी प्रकार रथहीन करके जो उनके प्रति कठोर बातें कही थीं, यह तेरा महान् अधर्म है। नीच मनुष्य वैसा कार्य करते हैं ॥ ११ १/२ ॥
नारिं जित्वातिकत्थन्ते न च जल्पन्ति दुर्वचः ॥ १२ ॥ न च कञ्चन निन्दन्ति सन्तः शूरा नरर्षभाः । ‘नरश्रेष्ठ शूरवीर सज्जन शत्रुको जीतकर बढ़-बढ़कर बातें नहीं बनाते, किसीको कटु वचन नहीं कहते और न किसीकी निन्दा ही करते हैं ॥ १२ १/२ ॥
त्वं तु प्राकृतविज्ञानस्तत् तद् वदसि सूतज ॥ १३ ॥ बह्वबद्धमकण्र्यं च चापलादपरीक्षितम् । ‘सूतपुत्र! तेरी बुद्धि बहुत ओछी है। इसीलिये तू चपलतावश बिना जाँचे-बूझे बहुत-सी न सुननेयोग्य असम्बद्ध बातें बक जाया करता है ॥ १३ १/२ ॥
युध्यमानं पराक्रान्तं शूरमार्यव्रते रतम् ॥ १४ ॥ यदवोचोऽप्रियं भीमं नैतत् सत्यं वचस्तव । ‘तूने युद्धमें संलग्न, श्रेष्ठ व्रतके पालनमें तत्पर, पराक्रमी और शूरवीर भीमसेनके प्रति जो अप्रिय वचन कहा है, तेरा यह कथन ठीक नहीं है ॥ १४ १/२ ॥
पश्यतां सर्वसैन्यानां केशवस्य ममैव च ॥ १५ ॥ विरथो भीमसेनेन कृतोऽसि बहुशो रणे । ‘सारी सेनाओंके देखते-देखते मेरे और श्रीकृष्णके सामने युद्धस्थलमें भीमसेनने तुझे अनेक बार रथहीन कर दिया है ॥ १५ १/२ ॥
न च त्वां परुषं किंचिदुक्तवान् पाण्डुनन्दनः ॥ १६ ॥