भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1075

ततो राजन् हृषीकेशः संग्रामशिरसि स्थितम् ॥ २४ ॥
तीर्णप्रतिज्ञं बीभत्सुं परिष्वज्यैनमब्रवीत् ।
राजन्! तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने प्रतिज्ञासे पार होकर युद्धके मुहानेपर खड़े हुए अर्जुनको हृदयसे लगाकर इस प्रकार कहा— ॥ २४ १/२ ॥
दिष्ट्या सम्पादिता जिष्णो प्रतिज्ञा महती त्वया ॥ २५ ॥
दिष्ट्या विनिहतः पापो वृद्धक्षत्रः सहात्मजः ।
‘विजयशील अर्जुन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने अपनी बड़ी भारी प्रतिज्ञा पूरी कर ली। सौभाग्यसे पापी वृद्धक्षत्र पुत्रसहित मारा गया ॥ २५ १/२ ॥
धार्तराष्ट्रबलं प्राप्य देवसेनापि भारत ॥ २६ ॥
सीदेत समरे जिष्णो नात्र कार्या विचारणा ।
‘भारत! दुर्योधनकी सेनामें पहुँचकर समरभूमिमें देवताओंकी सेना भी शिथिल हो सकती है। जिष्णो! इस विषयमें कोई दूसरा विचार नहीं करना चाहिये ॥ २६ १/२ ॥
न तं पश्यामि लोकेषु चिन्तयन् पुरुषं क्वचित् ॥ २७ ॥
त्वदृते पुरुषव्याघ्र य एतद् योधयेद् बलम् ।
‘पुरुषसिंह! मैं बहुत सोचनेपर भी तीनों लोकोंमें कहीं तुम्हारे सिवा किसी दूसरे पुरुषको ऐसा नहीं देखता, जो इस सेनाके साथ युद्ध कर सके ॥ २७ १/२ ॥
महाप्रभावा बहवस्त्वया तुल्याधिकाऽपि वा ॥ २८ ॥
समेताः पृथिवीपाला धार्तराष्ट्रस्य कारणात् ।
‘धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके लिये बहुत-से महान् प्रभावशाली राजा यहाँ एकत्र हो गये हैं, जिनमेंसे कितने ही तुम्हारे समान या तुमसे भी अधिक बलशाली हैं ॥
ते त्वां प्राप्य रणे क्रुद्धा नाभ्यवर्तन्त दंशितः ॥ २९ ॥
तव वीर्यं बलं चैव रुद्रशक्रान्तकोपमम् ।
‘वे भी रणक्षेत्रमें कवच बाँधकर कुपित हो तुम्हारा सामना करनेके लिये आये, परंतु टिक न सके। तुम्हारा बल और पराक्रम रुद्र, इन्द्र तथा यमराजके समान है ॥
नेदृशं शक्नुयात् कश्चिद् रणे कर्तुं पराक्रमम् ॥ ३० ॥
यादृशं कृतवानद्य त्वमेकः शत्रुतापनः ।
‘युद्धमें कोई भी ऐसा पराक्रम नहीं कर सकता, जैसा कि आज तुमने अकेले ही कर दिखाया है। वास्तवमें तुम शत्रुओंको संताप देनेवाले हो ॥ ३० १/२ ॥
एवमेव हते कर्णे सानुबन्धे दुरात्मनि ॥ ३१ ॥
वर्धयिष्यामि भूयस्त्वां विजितारिं हतद्विषम् ।
‘इसी प्रकार सगे-सम्बन्धियोंसहित दुरात्मा कर्णके मारे जानेपर शत्रुओंको जीतने और द्वेषी विपक्षियोंको मार डालनेवाले तुझ विजयी वीरको पुनः बधाई दूँगा’ ॥