महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1080, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंइदं महत् त्वय्युपपद्यते प्रभो रणाजिरे कर्म यशोविवर्धनम् । शतक्रतौ चापि च देवसत्तमे महाहवे जघ्नुषि दैत्यदानवान् ॥ ५७ ॥ प्रभो! समरांगणमें यह यशोवर्धक महान् कर्म करनेकी शक्ति तुममें तथा महायुद्धमें दैत्यों और दानवोंका संहार करनेवाले देवराज इन्द्रमें ही सम्भव है ॥ ५७ ॥
संजय उवाच
एवं संदर्शयन् कृष्णो रणभूमिं किरीटिने । स्वैः समेतः समुदितैः पाञ्चजन्यं व्यनादयत् ॥ ५८ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार किरीटधारी अर्जुनको रणभूमिका दृश्य दिखाते हुए भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ जुटे हुए स्वजनोंसहित पांचजन्य शंख बजाया ॥ ५८ ॥
स दर्शयन्नेव किरीटिनेऽरिहा जनार्दनस्तामरिभूमिमञ्जसा । अजातशत्रुं समुपेत्य पाण्डवं निवेदयामास हतं जयद्रथम् ॥ ५९ ॥ शत्रुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको इस प्रकार रणभूमिका दृश्य दिखाते हुए अनायास ही अजातशत्रु पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके पास पहुँचकर उनसे यह निवेदन किया कि जयद्रथ मारा गया ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ६५ श्लोक हैं।)