भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1085

‘जगतपते! वेदवेत्ता पुरुष आपको आदि-अन्तसे रहित, दिव्यस्वरूप, विश्वेश्वर, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, भूतात्मा, महात्मा, अनन्त तथा विश्वतोमुख आदि नामोंसे पुकारते हैं॥ ३० १/२ ॥ अपि देवा न जानन्ति गुह्यमाद्यं जगत्पतिम् ॥ ३१ ॥ नारायणं परं देवं परमात्मानमीश्वरम् । ज्ञानयोनिं हरिं विष्णुं मुमुक्षूणां परायणम् । परं पुराणं पुरुषं पुराणानां परं च यत् ॥ ३२ ॥ ‘आपका रहस्य गूढ़ है। आप सबके आदि कारण और इस जगत्के स्वामी हैं। आप ही परमदेव, नारायण, परमात्मा और ईश्वर हैं। ज्ञानस्वरूप श्रीहरि तथा मुमुक्षुओंके परम आश्रय भगवान् विष्णु भी आप ही हैं। आपके यथार्थ स्वरूपको देवता भी नहीं जानते हैं। आप ही परम पुराणपुरुष तथा पुराणोंसे भी परे हैं॥ एवमादिगुणानां ते कर्मणां दिवि चेह च । अतीतभूतभव्यानां संख्यातात्र न विद्यते ॥ ३३ ॥ सर्वतो रक्षणीयाः स्म शक्रेणेव दिवौकसः । यैस्त्वं सर्वगुणोपेतः सुहृन्न उपपादितः ॥ ३४ ॥ ‘आपके ऐसे-ऐसे गुणों तथा भूत, वर्तमान एवं भविष्यकालमें होनेवाले कर्मोंकी गणना करनेवाला इस भूलोकमें या स्वर्गमें भी कोई नहीं है। जैसे इन्द्र देवताओंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार हम सब लोग आपके द्वारा सर्वथा रक्षणीय हैं। हमें आप सर्वगुणसम्पन्न सुहृद्के रूपमें प्राप्त हुए हैं’ ॥ ३३-३४ ॥ इत्येवं धर्मराजेन हरिरुक्तो महायशाः । अनुरूपमिदं वाक्यं प्रत्युवाच जनार्दनः ॥ ३५ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर महायशस्वी भगवान् जनार्दनने उनके कथनके अनुरूप इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ३५ ॥ भवता तपसोग्रेण धर्मेण परमेण च । साधुत्वादार्जवाच्चैव हतः पापो जयद्रथः ॥ ३६ ॥ ‘धर्मराज! आपकी उग्र तपस्या, परम धर्म, साधुता तथा सरलतासे ही पापी जयद्रथ मारा गया है॥ ३६ ॥ अयं च पुरुषव्याघ्र त्वदनुध्यानसंवृतः । हत्वा योधसहस्राणि न्यहन् जिष्णुर्जयद्रथम् ॥ ३७ ॥ ‘पुरुषसिंह! आपने जो निरन्तर शुभ-चिन्तन किया है, उसीसे सुरक्षित हो अर्जुनने सहस्रों योद्धाओंका संहार करके जयद्रथका वध किया है॥ ३७ ॥ कृतित्वे बाहुवीर्ये च तथैवासम्भ्रमेऽपि च । शीघ्रतामोघबुद्धित्वे नास्ति पार्थसमः क्वचित् ॥ ३८ ॥