भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1088

दिष्ट्या पश्यामि वां शूरौ विमुक्तौ सैन्यसागरात् ॥ ५४ ॥ द्रोणग्राहदुराधर्षाद्धार्दिक्यमकरालयात् । वे बोले—'बड़े सौभाग्यकी बात है कि मैं तुम दोनों शूरवीरोंको शत्रुसेनाके समुद्रसे पार हुआ देख रहा हूँ। वह सैन्यसागर द्रोणाचार्यरूपी ग्राहके कारण दुर्धर्ष है और कृतवर्मा जैसे मगरोंका वासस्थान बना हुआ है ॥ ५४ १/२ ॥

दिष्ट्या विनिर्जिताः संख्ये पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ॥ ५५ ॥ युवां विजयिनौ चापि दिष्ट्या पश्यामि संयुगे । 'युद्धमें सारे भूपाल पराजित हो गये और संग्राम-भूमिमें मैं तुम दोनोंको विजयी देख रहा हूँ—यह बड़े हर्षका विषय है ॥ ५५ १/२ ॥

दिष्ट्या द्रोणोजितः संख्ये हार्दिक्यश्च महाबलः ॥ ५६ ॥ दिष्ट्या विकर्णिभिः कर्णो रणे नीतः पराभवम् । विमुखश्च कृतः शल्यो युवाभ्यां पुरुषर्षभौ ॥ ५७ ॥ 'हमारे सौभाग्यसे ही आचार्य द्रोण और महाबली कृतवर्मा युद्धमें परास्त हो गये। भाग्यसे ही कर्ण भी तुम्हारे बाणोंद्वारा रणक्षेत्रमें पराभवको पहुँच गया। नरश्रेष्ठ वीरो! तुम दोनोंने राजा शल्यको भी युद्धसे विमुख कर दिया ॥ ५६-५७ ॥

दिष्ट्या युवां कुशलिनौ संग्रामात् पुनरागतौ । पश्यामि रथिनां श्रेष्ठावुभौ युद्धविशारदौ ॥ ५८ ॥ 'रथियोंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें कुशल तुम दोनों वीरोंको मैं पुनः रणभूमिसे सकुशल लौटा हुआ देख रहा हूँ—यह मेरे लिये बड़े आनन्दकी बात है ॥ ५८ ॥

मम वाक्यकरौ वीरौ मम गौरवयन्त्रितौ । सैन्यार्णवं समुत्तीर्णौ दिष्ट्या पश्यामि वामहम् ॥ ५९ ॥ 'मेरे प्रति गौरवसे बँधकर मेरी आज्ञाका पालन करनेवाले तुम दोनों वीरोंको मैं सैन्य-समुद्रसे पार हुआ देख रहा हूँ, यह सौभाग्यका विषय है ॥ ५९ ॥

समरश्लाघिनौ वीरौ समरेष्वपराजितौ । मम वाक्यसमौ चैव दिष्ट्या पश्यामि वामहम् ॥ ६० ॥ 'तुम दोनों वीर मेरे कथनके अनुरूप ही युद्धकी श्लाघा रखनेवाले तथा समरांगणमें पराजित न होनेवाले हो। सौभाग्यसे मैं तुम दोनोंको यहाँ सकुशल देख रहा हूँ' ॥ ६० ॥

इत्युक्त्वा पाण्डवो राजन् युयुधानवृकोदरौ । सस्वजे पुरुषव्याघ्रौ हर्षाद् वाष्पं मुमोच ह ॥ ६१ ॥ राजन्! पुरुषसिंह सात्यकि और भीमसेनसे ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने उन दोनोंको हृदयसे लगा लिया और वे हर्षके आँसू बहाने लगे ॥ ६१ ॥

ततः प्रमुदितं सर्वं बलमासीद् विशाम्पते । पाण्डवानां रणे हृष्टं युद्धाय तु मनो दधे ॥ ६२ ॥