महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1099, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअश्वत्थाम्नि च कौरव्य निधनं सैन्धवोऽगमत् ॥ २२ ॥ कुरुनन्दन! तुम और कर्ण तो नहीं मर गये थे, कृपाचार्य, शल्य और अश्वत्थामा तो जीवित थे; फिर तुम्हारे रहते सिंधुराजकी मृत्यु क्यों हुई? ॥ २२ ॥
युध्यन्तः सर्वराजानस्तेजस्तिग्ममुपासते । सिन्धुराजं परित्रातुं स वो मध्ये कथं हतः ॥ २३ ॥ युद्ध करते हुए समस्त राजा सिंधुराजकी रक्षाके लिये प्रचण्ड तेजका आश्रय लिये हुए थे। फिर वह आपलोगोंके बीचमें कैसे मारा गया? ॥ २३ ॥
मय्येव हि विशेषेण तथा दुर्योधन त्वयि । आशंसत परित्राणमर्जुनात् स महीपतिः ॥ २४ ॥ दुर्योधन! राजा जयद्रथ विशेषतः मुझपर और तुमपर ही अर्जुनसे अपनी जीवन-रक्षाका भरोसा किये बैठा था ॥
ततस्तस्मिन् परित्राणमलब्धवति फाल्गुनात् । न किंचिदनुपश्यामि जीवितस्थानमात्मनः ॥ २५ ॥ तो भी जब अर्जुनसे उसकी रक्षा न की जा सकी, तब मुझे अब अपने जीवनकी रक्षाके लिये भी कोई स्थान दिखायी नहीं देता ॥ २५ ॥
मज्जन्तमिव चात्मानं धृष्टद्युम्नस्य किल्बिषे । पश्याम्यहत्वा पञ्चालान् सह तेन शिखण्डिना ॥ २६ ॥ मैं धृष्टद्युम्न और शिखण्डीसहित समस्त पांचालोंका वध न करके अपने-आपको धृष्टद्युम्नके पापपूर्ण संकल्पमें डूबता-सा देख रहा हूँ ॥ २६ ॥
तन्मां किमभितप्यन्तं वाक्शरैरेव कृन्तसि । अशक्तः सिन्धुराजस्य भूत्वा त्राणाय भारत ॥ २७ ॥ भारत! ऐसी दशामें तुम स्वयं सिंधुराजकी रक्षामें असमर्थ होकर मुझे अपने वाग्बाणोंसे क्यों छेद रहे हो? मै तो स्वयं ही संतप्त हो रहा हूँ ॥ २७ ॥
सौवर्णं सत्यसंधस्य ध्वजमक्लिष्टकर्मणः । अपश्यन् युधि भीष्मस्य कथमाशंससे जयम् ॥ २८ ॥ अनायास ही महान् कर्म करनेवाले सत्यप्रतिज्ञ भीष्मके सुवर्णमय ध्वजको अब युद्धस्थलमें फहराता न देखकर भी तुम विजयकी आशा कैसे करते हो? ॥ २८ ॥
मध्ये महारथानां च यत्राहन्यत सैन्धवः । हतो भूरिश्रवाश्चैव किं शेषं तत्र मन्यसे ॥ २९ ॥ जहाँ बड़े-बड़े महारथियोंके बीच सिंधुराज जयद्रथ और भूरिश्रवा मारे गये, वहाँ तुम किसके बचनेकी आशा करते हो? ॥ २९ ॥
कृप एव च दुर्धर्षो यदि जीवति पार्थिव । यो नागात् सिन्धुराजस्य वर्त्म तं पूजयाम्यहम् ॥ ३० ॥