महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1107, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजनीतिं व्यपाश्रित्य प्रहिताश्चैव काननम्। यत्नेन च कृतं तत्तद् दैवेन विनिपातितम्॥ २९॥ भारत! हमलोगोंने कपट करके कुन्तीकुमारोंको छला, उन्हें मारनेके लिये विषका प्रयोग किया, लाक्षागृहमें जलाया, जूएमैं हराया और राजनीतिका सहारा लेकर उन्हें वनमें भी भेजा। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक किये हुए हमारे उन सभी कार्योंको दैवने नष्ट कर दिया॥ २८-२९॥
युध्यस्व यत्नमास्थाय दैवं कृत्वा निरर्थकम्। यततस्तव तेषां च दैवं मार्गेण यास्यति॥ ३०॥ फिर भी तुम दैवको व्यर्थ समझकर प्रयत्नपूर्वक युद्ध करो। तुम्हारे और पाण्डवोंके अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्न करते रहनेपर दैव अपने गन्तव्य मार्गसे जाता रहेगा॥ ३०॥
न तेषां मतिपूर्वं हि सुकृतं दृश्यते क्वचित्। दुष्कृतं तव वा वीर बुद्ध्या हीनं कुरूद्वह॥ ३१॥ वीर कुरुश्रेष्ठ! मुझे तो पाण्डवोंका बुद्धिपूर्वक किया हुआ कहीं कोई सुकृत नहीं दिखायी देता अथवा तुम्हारा बुद्धिहीनतापूर्वक किया हुआ कोई दुष्कृत भी देखनेमें नहीं आता॥ ३१॥
दैवं प्रमाणं सर्वस्य सुकृतस्येतरस्य वा। अनन्यकर्म दैवं हि जागर्ति स्वपतामपि॥ ३२॥ सुकृत हो या दुष्कृत, सबपर दैवका ही अधिकार है; वही उसका फल देनेवाला है। अपना ही पूर्वकृत कर्म दैव है, जो मनुष्योंके सो जानेपर भी जागता रहता है॥ ३२॥
बहूनि तव सैन्यानि योधाश्च बहवस्तव। न तथा पाण्डुपुत्राणामेवं युद्धमवर्तत॥ ३३॥ पहले तुम्हारे पास बहुत-सी सेनाएँ और बहुत-से योद्धा थे। पाण्डवोंके पास उतने सैनिक नहीं थे। इस अवस्थामें युद्ध आरम्भ हुआ था॥ ३३॥
तैरल्पैर्बहवो यूयं क्षयं नीताः प्रहारिणः। शङ्के दैवस्य तत् कर्म पौरुषं येन नाशितम्॥ ३४॥ तथापि उन अल्पसंख्यकोंने तुम बहुसंख्यक योद्धाओंको क्षीण कर दिया। मैं समझता हूँ, वह दैवका ही कर्म है; जिसने तुम्हारे पुरुषार्थका नाश कर दिया है॥ ३४॥
संजय उवाच
एवं सम्भाषमाणानां बहु तत् तज्जनाधिप। पाण्डवानामनीकानि समदृश्यन्त संयुगे॥ ३५॥