भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1114

ततो दुर्योधनः क्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः ।। ३० ।। विव्याध दशभिस्तूर्णं ध्वजं चिच्छेद चेषुणा । तब दुर्योधनने कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले दस बाणोंद्वारा तुरंत ही युधिष्ठिरको घायल कर दिया और एक बाणसे उनका ध्वज भी काट डाला ।। ३० १/२ ।। इन्द्रसेनं त्रिभिश्चैव ललाटे जघ्निवान् नृप ।। ३१ ।। सारथिं दयितं राज्ञः पाण्डवस्य महात्मनः । नरेश्वर! उन्होंने तीन बाणोंद्वारा महात्मा पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरके प्रिय सारथि इन्द्रसेनको उसके ललाट-प्रदेशमें चोट पहुँचायी ।। ३१ १/२ ।। धनुश्च पुनरन्येन चकर्तस्य महारथः ।। ३२ ।। चतुर्भिश्चतुरश्चैव बाणैर्विव्याध वाजिनः । फिर दूसरे बाणसे महारथी दुर्योधनने राजा युधिष्ठिरका धनुष भी काट दिया और चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको बींध डाला ।। ३२ १/२ ।। ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धो निमेषादिव कार्मुकम् ।। ३३ ।। अन्यदादाय वेगेन कौरवं प्रत्यवारयत् । तब राजा युधिष्ठिरने कुपित हो पलक मारते-मारते दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और बड़े वेगसे कुरुवंशी दुर्योधनको रोका ।। ३३ १/२ ।। तस्य तान् निघ्नतः शत्रून् रुक्मपृष्ठं महद् धनुः ।। ३४ ।। भल्लाभ्यां पाण्डवो ज्येष्ठस्त्रिधा चिच्छेद मारिष । माननीय नरेश! ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरने दो भल्ल मारकर शत्रुओंके संहारमें लगे हुए दुर्योधनके सुवर्णमय पृष्ठवाले विशाल धनुषके तीन टुकड़े कर डाले ।। ३४ १/२ ।। विव्याध चैनं दशभिः सम्यगस्तैः शितैः शरैः ।। ३५ ।। मर्म भित्त्वा तु ते सर्वे संलग्नाः क्षितिमाविशन् । साथ ही, उन्होंने अच्छी तरह चलाये हुए दस पैने बाणोंसे दुर्योधनको भी घायल कर दिया। वे सारे बाण दुर्योधनके मर्मस्थानोंमें लगकर उन्हें विदीर्ण करते हुए पृथ्वीमें समा गये ।। ३५ १/२ ।। ततः परिवृता योधाः परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् ।। ३६ ।। वृत्रहत्यै यथा देवाः परिवव्रुः पुरंदरम् । फिर तो भागे हुए पाण्डव-योद्धा लौट आये और युधिष्ठिरको वैसे ही घेरकर खड़े हो गये, जैसे वृत्रासुरके वधके लिये सब देवता इन्द्रको घेरकर खड़े हुए थे ।। ततो युधिष्ठिरो राजा तव पुत्रस्य मारिष । शरं च सूर्यरश्म्याभमत्युग्रमनिवारणम् ।। ३७ ।। हा हतोऽसीति राजानमुक्त्वामुञ्चद् युधिष्ठिरः ।