भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1168, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1168

येषामर्थाय युध्यन्ते न तेषां विद्यते क्षयः ॥ ४३ ॥ जिनके लिये शतानीक, सूर्यदत्त, श्रुतानीक, श्रुतध्वज, बलानीक, जयानीक, जयाश्व, रथवाहन, चन्द्रोदय तथा समर्थ—ये विराटके श्रेष्ठ भाई और इन भाइयोंसहित मत्स्यराज विराट युद्ध करनेको तैयार हैं, नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पुत्र तथा राक्षस घटोत्कच—ये वीर जिनके लिये युद्ध कर रहे हैं, उन पाण्डवोंकी कभी कोई क्षति नहीं हो सकती है ॥ ४१—४३ ॥

एते चान्ये च बहवो गुणाः पाण्डुसुतस्य वै । कामं खलु जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ४४ ॥ सयक्षराक्षसगणं सभूतभुजगद्विपम् । निःशेषमस्त्रवीर्येण कुर्वीते भीमफाल्गुनौ ॥ ४५ ॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके ये तथा और भी बहुत-से गुण हैं। भीमसेन और अर्जुन यदि चाहें तो अपने अस्त्रबलसे देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, भूत, नाग और हाथियोंसहित इस सम्पूर्ण जगत्‌का सर्वथा विनाश कर सकते हैं ॥

युधिष्ठिरश्च पृथिवीं निर्दहेद् घोरचक्षुषा । अप्रमेयबलः शौरिर्येषामर्थे च दंशितः ॥ ४६ ॥ कथं तान् संयुगे कर्ण जेतुमुत्सहसे परान् । युधिष्ठिर भी यदि रोषभरी दृष्टिसे देखें तो इस भूमण्डलको भस्म कर सकते हैं। कर्ण! जिनके लिये अनन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्ण भी कवच धारण करके लड़नेको तैयार हैं, उन शत्रुओंको युद्धमें जीतनेका साहस तुम कैसे कर रहे हो? ॥ ४६ १/२ ॥

महानपनयस्त्वेष नित्यं हि तव सूतज ॥ ४७ ॥ यस्त्वमुत्सहसे योद्धुं समरे शौरिणा सह । सूतपुत्र! तुम जो सदा समरभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेका उत्साह दिखाते हो, यह तुम्हारा महान् अन्याय (अक्षम्य अपराध) है ॥ ४७ १/२ ॥

संजय उवाच

एवमुक्तस्तु राधेयः प्रहसन् भरतर्षभ ॥ ४८ ॥ अब्रवीच्च तदा कर्णो गुरुं शारद्वतं कृपम् । **संजय कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर राधापुत्र कर्ण ठठाकर हँस पड़ा और शरद्वान्‌के पुत्र गुरु कृपाचार्यसे उस समय यों बोला— ॥ ४८ १/२ ॥

सत्यमुक्तं त्वया ब्रह्मन् पाण्डवान् प्रति यद् वचः ॥ ४९ ॥ एते चान्ये च बहवो गुणाः पाण्डुसुतेषु वै । ‘बाबाजी! पाण्डवोंके विषयमें तुमने जो बात कही है वह सब सत्य है। यही नहीं, पाण्डवोंमें और भी बहुत-से गुण हैं ॥ ४९ १/२ ॥