भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1170

अत्रापि शृणु मे वाक्यं यथावद् ब्रुवतो द्विज । ‘ब्रह्मन्! दुर्मते! तुम तो युद्धस्थलमें समस्त कौरव-सेनाओंको भयभीत करनेके लिये पाण्डवोंके गुण गाना चाहते हो, उसके विषयमें भी मैं जो यथार्थ बात कह रहा हूँ, उसे सुन लो ॥ ५८ १/२ ॥

दुर्योधनश्च द्रोणश्च शकुनिर्दुर्मुखो जयः ॥ ५९ ॥ दुःशासनो वृषसेनो मद्रराजस्त्वमेव च । सोमदत्तश्च भूरिश्च तथा द्रौणिर्विविंशतिः ॥ ६० ॥ तिष्ठेयुर्दंशिता यत्र सर्वे युद्धविशारदाः । जयेदेतान् नरः को नु शक्रतुल्यबलोऽप्यरिः ॥ ६१ ॥ ‘दुर्योधन, द्रोण, शकुनि, दुर्मुख, जय, दुःशासन, वृषसेन, मद्रराज शल्य, तुम स्वयं, सोमदत्त, भूरि, अश्वत्थामा और विविंशति—ये युद्धकुशल सम्पूर्ण वीर जहाँ कवच बाँधकर खड़े हो जायँगे, वहाँ इन्हें कौन मनुष्य जीत सकता है? वह इन्द्रके तुल्य बलवान् शत्रु ही क्यों न हो (इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता) ॥

शूराश्च हि कृतास्त्राश्च बलिनः स्वर्गलिप्सवः । धर्मज्ञा युद्धकुशला हन्युर्युद्धे सुरानपि ॥ ६२ ॥ ‘जो शूरवीर, अस्त्रोंके ज्ञाता, बलवान्, स्वर्गप्राप्तिकी अभिलाषा रखनेवाले, धर्मज्ञ और युद्धकुशल हैं वे देवताओंको भी युद्धमें मार सकते हैं ॥ ६२ ॥

एते स्थास्यन्ति संग्रामे पाण्डवानां वधार्थिनः । जयमाकाङ्क्षमाणा हि कौरवेयस्य दंशिताः ॥ ६३ ॥ ‘ये वीरगण कुरुराज दुर्योधनकी जय चाहते हुए पाण्डवोंके वधकी इच्छासे संग्राममें कवच बाँधकर डट जायँगे ॥ ६३ ॥

दैवायत्तमहं मन्ये जयं सुबलिनामपि । यत्र भीष्मो महाबाहुः शेते शरशताचितः ॥ ६४ ॥ ‘मैं तो बड़े-से-बड़े बलवानोंकी भी विजय दैवके ही अधीन मानता हूँ। दैवाधीन होनेके कारण महाबाहु भीष्म आज सैकड़ों बाणोंसे विद्ध होकर रणभूमिमें शयन करते हैं ॥ ६४ ॥

विकर्णश्चित्रसेनश्च बाह्लीकोऽथ जयद्रथः । भूरिश्रवा जयश्चैव जलसंधः सुदक्षिणः ॥ ६५ ॥ शलश्च रथिनां श्रेष्ठो भगदत्तश्च वीर्यवान् । एते चान्ये च राजानो देवैरपि सुदुर्जयाः ॥ ६६ ॥ ‘विकर्ण, चित्रसेन, बाह्लीक, जयद्रथ, भूरिश्रवा, जय, जलसंध, सुदक्षिण, रथियोंमें श्रेष्ठ शल तथा पराक्रमी भगदत्त—ये और दूसरे भी बहुत-से राजा देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय थे ॥ ६५-६६ ॥