महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1178, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'रणभूमिमें वह कवचधारी कर्ण समस्त राजाओंके साथ अकेला ही युद्ध कर रहा है। देखो, कर्णके बाणोंसे पीड़ित हुई यह पाण्डव-सेना कार्तिकेयके द्वारा नष्ट की हुई असुरवाहिनीके समान भागी जा रही है ।। ४२-४३ ।।
दृष्ट्वैतां निर्जितां सेनां रणे कर्णेन धीमता ।
अभियात्येष बीभत्सुः सूतपुत्रजिघांसया ।। ४४ ।।
'बुद्धिमान् कर्णके द्वारा रणभूमिमें पराजित हुई इस सेनाको देखकर सूतपुत्रका वध करनेकी इच्छासे ये अर्जुन आगे बढ़े जा रहे हैं ।। ४४ ।।
तद् यथा प्रेक्षमाणानां सूतपुत्रं महारथम् ।
न हन्यात् पाण्डवः संख्ये तथा नीतिर्विधीयताम् ।। ४५ ।।
'अतः हमलोगोंके देखते-देखते युद्धमें पाण्डुपुत्र अर्जुन-जैसे भी महारथी सूतपुत्रको न मार सकें, वैसी नीतिसे काम लो' ।। ४५ ।।
ततो द्रौणिः कृपः शल्यो हार्दिक्यश्च महारथः ।
प्रत्युद्ययुस्तदा पार्थं सुतपुत्रपरीप्सया ।। ४६ ।।
आयान्तं वीक्ष्य कौन्तेयं शक्रं दैत्यचमूमिव ।
तब दैत्य-सेनापर आक्रमण करनेवाले इन्द्रके समान अर्जुनको कौरव-सेनाकी ओर आते देख अश्वत्थामा, कृपाचार्य शल्य और महारथी कृतवर्मा सूतपुत्रकी रक्षा करनेकी इच्छासे अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ।। ४६ १/२ ।।
बीभत्सुरपि राजेन्द्र पञ्चालैरभिसंवृतः ।। ४७ ।।
प्रत्युद्ययौ तदा कर्णं यथा वृत्रं शतक्रतुः ।
राजेन्द्र! उस समय वृत्रासुरपर चढ़ाई करनेवाले इन्द्रके समान पांचालोंसे घिरे हुए अर्जुनने भी कर्णपर धावा किया ।। ४७ १/२ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
संरब्धं फाल्गुनं दृष्ट्वा कालान्तकयमोपमम् ।। ४८ ।।
कर्णो वैकर्तनः सूत प्रत्यपद्यत् किमुत्तरम् ।
**धृतराष्ट्रने पूछा—**सूत! काल, अन्तक और यमके समान क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको देखकर वैकर्तन कर्णने उन्हें किस प्रकार उत्तर दिया? (कैसे उनका सामना किया) ।। ४८ १/२ ।।
यो ह्यस्पर्धत पार्थेन नित्यमेव महारथः ।। ४९ ।।
आशंसते च बीभत्सुं युद्धे जेतुं सुदारुणम् ।
महारथी कर्ण सदा ही अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता था और युद्धमें अत्यन्त भयंकर अर्जुनको पराजित करनेका विश्वास प्रकट करता था ।। ४९ १/२ ।।
स तु तं सहसा प्राप्तं नित्यमत्यन्तवैरिणम् ।। ५० ।।