महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवधे कुन्तिसुतस्याजौ नाचार्य विजयो मम । हते युधिष्ठिरे पार्था हन्युः सर्वान् हि नो ध्रुवम् ॥ १५ ॥ ‘आचार्य! युद्धके मैदानमें कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके मारे जानेसे मेरी विजय नहीं हो सकती; क्योंकि युधिष्ठिरका वध होनेपर कुन्तीके पुत्र हम सब लोगोंको अवश्य ही मार डालेंगे ॥ १५ ॥
न च शक्या रणे सर्वे निहन्तुममरैरपि । (यदि सर्वे हनिष्यन्ते पाण्डवाः ससुता मृधे । ततः कृत्स्नं वशे कृत्वा निःशेषं नृपमण्डलम् ॥ ससागरवनां स्फीतां विजित्य वसुधामिमाम् । विष्णुर्दास्यति कृष्णायै कुन्त्यै वा पुरुषोत्तमः ॥) य एव तेषां शेषः स्यात् स एवास्मान् न शेषयेत् ॥ १६ ॥ ‘सम्पूर्ण देवता भी समस्त पाण्डवोंको रणक्षेत्रमें नहीं मार सकते। यदि सारे पाण्डव अपने पुत्रोंसहित युद्धमें मार डाले जायँगे तो भी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण नरेशमण्डलको अपने वशमें करके समुद्र और वनोंसहित इस सारी समृद्धिशालिनी वसुधाको जीतकर द्रौपदी अथवा कुन्तीको दे डालेंगे। अथवा पाण्डवोंमेंसे जो भी शेष रह जायगा, वही हमलोगोंको शेष नहीं रहने देगा ॥ १६ ॥
सत्यप्रतिज्ञे त्वानीते पुनर्धूतेन निर्जिते । पुनर्यास्यन्त्यरण्याय पाण्डवास्तमनुव्रताः ॥ १७ ॥ ‘सत्यप्रतिज्ञ राजा युधिष्ठिरको जीते-जी पकड़ ले आनेपर यदि उन्हें पुनः जूएमें जीत लिया जाय तो उनमें भक्ति रखनेवाले पाण्डव पुनः वनमें चले जायँगे ॥ १७ ॥
सोऽयं मम जयो व्यक्तं दीर्घकालं भविष्यति । अतो न वधमिच्छामि धर्मराजस्य कर्हिचित् ॥ १८ ॥ ‘इस प्रकार निश्चय ही मेरी विजय दीर्घकालतक बनी रहेगी। इसीलिये मैं कभी धर्मराज युधिष्ठिरका वध करना नहीं चाहता’ ॥ १८ ॥
तस्य जिह्ममभिप्रायं ज्ञात्वा द्रोणोऽथ तत्त्ववित् । तं वरं सान्तरं तस्मै ददौ संचिन्त्य बुद्धिमान् ॥ १९ ॥ राजन्! द्रोणाचार्य प्रत्येक बातके वास्तविक तात्पर्यको तत्काल समझ लेनेवाले थे। दुर्योधनके उस कुटिल मनोभावको जानकर बुद्धिमान् द्रोणने मन-ही-मन कुछ विचार किया और अन्तर रखकर उसे वर दिया ॥ १९ ॥
द्रोण उवाच न चेद् युधिष्ठिरं वीरः पालयत्यर्जुनो युधि । मन्यस्व पाण्डवश्रेष्ठमानीतं वशमात्मनः ॥ २० ॥