महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1188, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअद्य धर्मसुतो राजा दृष्ट्वा मम पराक्रमम् ।। १४ ।।
अश्वत्थाममयं लोकं मंस्यते सह सोमकैः ।
‘आज सोमकोंसहित धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर मेरा पराक्रम देखकर सम्पूर्ण जगत्को अश्वत्थामासे भरा हुआ मानेंगे ।। १४ १/२ ।।
आगमिष्यति निर्वेदं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। १५ ।।
दृष्ट्वा विनिहतान् संख्ये पञ्चालान् सोमकैः सह ।
‘सोमकोंसहित पांचालोंको युद्धमें मारा गया देख आज धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें बड़ा निर्वेद (खेद एवं वैराग्य) होगा ।। १५ १/२ ।।
ये मां युद्धेऽभियोत्स्यन्ति तान् हनिष्यामि भारत ।। १६ ।।
न हि ते वीर मोक्ष्यन्ते मद्बाह्वन्तरमागताः ।
‘भारत! जो लोग रणभूमिमें मेरे साथ युद्ध करेंगे, उन्हें मैं मार डालूँगा। वीर! मेरी भुजाओंके भीतर आकर शत्रुसैनिक जीवित नहीं छूट सकेंगे’ ।। १६ १/२ ।।
एवमुक्त्वा महाबाहुः पुत्रं दुर्योधनं तव ।। १७ ।।
अभ्यवर्तत युद्धाय त्रासयन् सर्वधन्विनः ।
चिकीर्षुस्तव पुत्राणां प्रियं प्राणभृतां वरः ।। १८ ।।
आपके पुत्र दुर्योधनसे ऐसा कहकर महाबाहु अश्वत्थामा समस्त धनुर्धरोंको त्रास देता हुआ युद्धके लिये शत्रुओंके सामने डट गया। प्राणियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा आपके पुत्रोंका प्रिय करना चाहता था ।। १७-१८ ।।
ततोऽब्रवीत् सकैकेयान् पञ्चालान् गौतमीसुतः ।
प्रहरध्वमितः सर्वे मम गात्रे महारथाः ।। १९ ।।
स्थिरीभूताश्च युध्यध्वं दर्शयन्तोऽस्त्रलाघवम् ।
तदनन्तर गौतमीनन्दन अश्वत्थामाने केकयोंसहित पांचालोंसे कहा—‘महारथियो! अब सब लोग मिलकर मेरे शरीरपर प्रहार करो और अपनी अस्त्र-संचालनकी फुर्ती दिखाते हुए सुस्थिर होकर युद्ध करो’ ।। १९ १/२ ।।
एवमुक्तास्तु ते सर्वे शस्त्रवृष्टीरपातयन् ।। २० ।।
द्रौणिं प्रति महाराज जलं जलधरा इव ।
महाराज! अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर वे सभी वीर उसके ऊपर उसी प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे, जैसे मेघ पर्वतपर पानी बरसाते हैं ।। २० १/२ ।।
तान् निहत्य शरान्द्रौणिर्दश वीरानपोथयत् ।। २१ ।।
प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां धृष्टद्युम्नस्य च प्रभो ।
प्रभो! द्रोणकुमारने उनके उन बाणोंको नष्ट करके उनमेंसे दस वीरोंको पाण्डवों और धृष्टद्युम्नके सामने ही मार गिराया ।। २१ १/२ ।।