भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1205

तदनन्तर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे कहा—'महाबाहु युधिष्ठिर! मैं तुमसे जो कह रहा हूँ, उसे सुनो। भरतश्रेष्ठ! तुम युद्धमें द्रोणाचार्यसे अलग रहो॥ ४६-४७ ॥ यतते हि सदा द्रोणो ग्रहणे तव संयुगे । नानुरूपमहं मन्ये युद्धमस्य त्वया सह ॥ ४८ ॥ 'क्योंकि द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें सदा तुम्हें कैद करनेके प्रयत्नमें रहते हैं; अतः तुम्हारे साथ इनका युद्ध होना मैं उचित नहीं मानता ॥ ४८ ॥ योऽस्य सृष्टो विनाशाय स एवैनं हनिष्यति । परिवर्ज्य गुरुं याहि यत्र राजा सुयोधनः ॥ ४९ ॥ 'जो इनके विनाशके लिये उत्पन्न हुआ है, वही इन्हें मारेगा। तुम अपने गुरुदेवको छोड़कर जहाँ राजा दुर्योधन हैं, वहाँ जाओ ॥ ४९ ॥ राजा राज्ञा हि योद्धव्यो नाराज्ञा युद्धमिष्यते । तत्र त्वं गच्छ कौन्तेय हस्त्यश्वरथसंवृतः ॥ ५० ॥ 'क्योंकि राजाको राजाके ही साथ युद्ध करना चाहिये। जो राजा नहीं है, उसके साथ उसका युद्ध अभीष्ट नहीं है। अतः कुन्तीनन्दन! तुम हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनासे घिरे रहकर वहीं जाओ ॥ ५० ॥ यावन्मात्रेण च मया सहायेन धनंजयः । भीमश्च रथशार्दूलो युध्यते कौरवैः सह ॥ ५१ ॥ 'तबतक मेरे साथ रहकर अर्जुन तथा रथियोंमें सिंहके समान पराक्रमी भीमसेन कौरवोंके साथ युद्ध करते हैं'॥ वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । मुहूर्तं चिन्तयित्वा तु ततो दारुणमाहवम् ॥ ५२ ॥ प्रायाद् द्रुतममित्रघ्नो यत्र भीमो व्यवस्थितः । विनिघ्नंस्तावकान् योधन् व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ५३ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने दो घड़ीतक उस दारुण युद्धके विषयमें सोचा। फिर वे तुरंत वहाँ चले गये, जहाँ शत्रुओंका संहार करनेवाले भीमसेन आपके योद्धाओंका वध करते हुए मुँह फैलाये यमराजके समान खड़े थे ॥ ५२-५३ ॥ रथघोषेण महता नादयन् वसुधातलम् । पर्जन्य इव घर्मान्ते नादयन् वै दिशो दश ॥ ५४ ॥ भीमस्य निघ्नतः शत्रून् पार्ष्णिं जग्राह पाण्डवः । द्रोणोऽपि पाण्डुपञ्चालान् व्यधमद् रजनीमुखे ॥ ५५ ॥