भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1208

आपके पुत्र दुर्योधनकी सलाहसे होनेवाले उस युद्धके भीतर प्रगाढ़ अन्धकारमें किंकर्तव्यविमूढ़ हुए सहस्रों महारथियोंने एक-दूसरेको मार डाला ।। ६ १/२ ।।
ततः सर्वाणि सैन्यानि सेनागोपांश्च भारत ।
व्यमुह्यन्त रणे तत्र तमसा संवृते सति ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! तदनन्तर उस रणभूमिके तिमिराच्छन्न हो जानेपर समस्त सेनाएँ और सेनापति मोहित हो गये ।।

धृतराष्ट्र उवाच

तेषां संलोड्यमानानां पाण्डवैर्विहतौजसाम् ।
अन्धे तमसि मग्नानामासीत् किं वो मनस्तदा ॥ ८ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जिस समय तुम सब लोग अन्धकारमें डूबे हुए थे और पाण्डव तुम्हारे बल और पराक्रमको नष्ट करके तुम्हें मथे डालते थे, उस समय तुम्हारे और उन पाण्डवोंके मनकी कैसी अवस्था थी? ।।
कथं प्रकाशस्तेषां वा मम सैन्यस्य वा पुनः ।
बभूव लोके तमसा तथा संजय संवृते ॥ ९ ॥
संजय! जब कि सारा जगत् अन्धकारसे आवृत था, उस समय पाण्डवोंको अथवा मेरी सेनाको कैसे प्रकाश प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥

संजय उवाच

ततः सर्वाणि सैन्यानि हतशिष्टानि यानि वै ।
सेनागोप्तॄनथादिश्य पुनर्व्यूहमकल्पयत् ॥ १० ॥
**संजयने कहा—**राजन्! तदनन्तर जितनी सेनाएँ मरनेसे बची हुई थीं, उन सबको तथा सेनापतियोंको आदेश देकर दुर्योधनने उनका पुनः व्यूह-निर्माण करवाया ।।
द्रोणः पुरस्ताज्जघने तु शल्य-
स्तथा द्रौणिः पार्श्वतः सौबलश्च ।
स्वयं तु सर्वाणि बलानि राजन्
राजाभ्ययाद् गोपयन् वै निशायाम् ॥ ११ ॥
राजन्! उस व्यूहके अग्रभागमें द्रोणाचार्य, मध्यभागमें शल्य तथा पार्श्वभागमें अश्वत्थामा और शकुनि थे। स्वयं राजा दुर्योधन उस रात्रिके समय सम्पूर्ण सेनाओंकी रक्षा करता हुआ युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ।। ११ ।।
उवाच सर्वांश्च पदातिसङ्घान्
दुर्योधनः पार्थिव सान्त्वपूर्वम् ।
उत्सृज्य सर्वे परमायुधानि
गृह्णीत हस्तैर्ज्वलितान् प्रदीपान् ॥ १२ ॥