महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1217, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंथे और रणमें शत्रुसैनिकोंका संहार करनेवाले कौन-कौन-से योद्धा आचार्यके आगे-आगे चलते थे? ।। १३-१४ ।। यत् प्राविशन्महेष्वासः पञ्चालानपराजितः । नृत्यन्निव नरव्याघ्रो रथमार्गेषु वीर्यवान् ।। १५ ।। महाधनुर्धर, पराक्रमी एवं किसीसे पराजित न होनेवाले पुरुषसिंह द्रोणाचार्यने रथके मार्गोंपर नृत्य-सा करते हुए वहाँ पांचालोंकी सेनामें प्रवेश किया था ।। १५ ।। यो ददाह शरैर्द्रोणः पञ्चालानां रथव्रजान् । धूमकेतुरिव क्रुद्धः कथं मृत्युमुपेयिवान् ।। १६ ।। जिन आचार्य द्रोणने क्रोधमें भरे हुए अग्निदेवके समान अपने बाणोंकी ज्वालासे पांचाल महारथियोंके समुदायोंको जलाकर भस्म कर दिया था, वे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? ।। १६ ।। अव्यग्रानेव हि परान् कथयस्यपराजितान् । हृष्टानुदीर्णान् संग्रामे न तथा सूत मामकान् ।। १७ ।। सूत! तुम मेरे शत्रुओंको तो व्यग्रतारहित, अपराजित, हर्ष और उत्साहसे युक्त तथा संग्राममें वेगपूर्वक आगे बढ़नेवाले ही बता रहे हो; परंतु मेरे पुत्रोंकी ऐसी अवस्था नहीं बताते ।। १७ ।। हतांश्चैव विदीर्णांश्च विप्रकीर्णांश्च शंससि । रथिनो विरथांश्चैव कृतान् युद्धेषु मामकान् ।। १८ ।। सभी युद्धोंमें मेरे पक्षके रथियोंको तुम हताहत, छिन्न-भिन्न, तितर-बितर तथा रथहीन हुआ ही बता रहे हो ।। १८ ।।
संजय उवाच
द्रोणस्य मतमाज्ञाय योद्धुकामस्य तां निशाम् । दुर्योधनो महाराज वश्यान् भ्रातृनुवाच ह ।। १९ ।। कर्णं च वृषसेनं च मद्रराजं च कौरव । दुर्धर्षं दीर्घबाहुं च ये च तेषां पदानुगाः ।। २० ।। **संजय कहते हैं—**कुरुनन्दन महाराज! युद्धकी इच्छावाले द्रोणाचार्यका मत जानकर दुर्योधनने उस रातमें अपने वशवर्ती भाइयोंसे तथा कर्ण, वृषसेन, मद्रराज शल्य, दुर्धर्ष, दीर्घबाहु तथा जो-जो उनके पीछे चलनेवाले थे, उन सबसे इस प्रकार कहा— ।। द्रोणं यत्ताः पराक्रान्ताः सर्वे रक्षन्तु पृष्ठतः । हार्दिक्यो दक्षिणं चक्रं शल्यश्चैवोत्तरं तथा ।। २१ ।। ‘तुम सब लोग सावधान रहकर पराक्रमपूर्वक पीछेकी ओरसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करो। कृतवर्मा उनके दाहिने पहियेकी और राजा शल्य बायें पहियेकी रक्षा करें’ ।। २१ ।।