महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्जुन उवाच
यथा मे न वधः कार्य आचार्यस्य कदाचन ॥ ७ ॥ तथा तव परित्यागो न मे राजंश्चिकीर्षितः । **अर्जुन बोले—**राजन्! जिस प्रकार मेरे लिये आचार्यका कभी वध न करना कर्तव्य है, उसी प्रकार किसी भी दशामें आपका परित्याग करना मुझे अभीष्ट नहीं है ॥
अप्येवं पाण्डव प्राणानुत्सृजेयमहं युधि ॥ ८ ॥ प्रतीपो नाहमाचार्ये भवेयं वै कथंचन । पाण्डुनन्दन! इस नीतिके अनुसार बर्ताव करते हुए मैं युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा; परंतु किसी प्रकार भी आचार्यका शत्रु नहीं बनूँगा ॥ ८ १/२ ॥
त्वां निगृह्याहवे राज्यं धार्तराष्ट्रोऽयमिच्छति ॥ ९ ॥ न स तं जीवलोकेऽस्मिन् कामं प्राप्स्येत् कथंचन । महाराज! यह धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जो आपको युद्धमें कैद करके सारा राज्य हथिया लेना चाहता है, वह इस जगत्में अपने उस मनोरथको किसी प्रकार पूर्ण नहीं कर सकता ॥ ९ १/२ ॥
प्रपतेद् द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् ॥ १० ॥ न त्वां द्रोणो निगृह्णीयाज्जीवमाने मयि ध्रुवम् । नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े और पृथ्वीके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ, तो भी मेरे जीते-जी द्रोणाचार्य आपको पकड़ नहीं सकते; यह ध्रुव सत्य है ॥ १० १/२ ॥
यदि तस्य रणे साह्यं कुरुते वज्रभृत् स्वयम् ॥ ११ ॥ विष्णुर्वा सहितो देवैर्न त्वां प्राप्स्यत्यसौ मृधे । मयि जीवति राजेन्द्र न भयं कर्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ द्रोणादस्त्रभृतां श्रेष्ठात् सर्वशस्त्रभृतामपि । राजेन्द्र! यदि रणक्षेत्रमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र अथवा भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर दुर्योधनकी सहायता करें, तो भी मेरे जीते-जी वह आपको पकड़ नहीं सकेगा; अतः आपको सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यसे भय नहीं करना चाहिये ॥ ११-१२ १/२ ॥
अन्यच्च ब्रूयां राजेन्द्र प्रतिज्ञां मम निश्चलाम् ॥ १३ ॥ न स्मराम्यनृतं तावन्न स्मरामि पराजयम् । न स्मरामि प्रतिश्रुत्य किंचिदप्यनृतं कृतम् ॥ १४ ॥ महाराज! मैं अपनी दूसरी भी निश्चल प्रतिज्ञा आपको सुनाता हूँ। मैंने कभी झूठ कहा हो, इसका स्मरण नहीं है। मेरी कहीं पराजय हुई हो, इसकी भी याद नहीं है और मैंने