महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1222, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! द्रोणाचार्यको पकड़नेके लिये आते हुए महारथी पाण्डुपुत्र सहदेवको वैकर्तन कर्णने रोका ॥ ७ ॥ भीमसेनमथायान्तं व्यादितास्यमिवान्तकम् । स्वयं दुर्योधनो राजा प्रतीपं मृत्युमाव्रजत् ॥ ८ ॥ मुँह बाये यमराजके समान अथवा विपक्षी बनकर आयी हुई मृत्युके समान भीमसेनका सामना स्वयं राजा दुर्योधनने किया ॥ ८ ॥ नकुलं च युधां श्रेष्ठं सर्वयुद्धविशारदम् । शकुनिः सौबलो राजन् वारयामास सत्वरः ॥ ९ ॥ राजन्! सम्पूर्ण युद्धकलामें कुशल योद्धाओंमें श्रेष्ठ नकुलको सुबलपुत्र शकुनिने शीघ्रतापूर्वक आकर रोका ॥ ९ ॥ शिखण्डिनमथायान्तं रथेन रथिनां वरम् । कृपः शारद्वतो राजन् वारयामास संयुगे ॥ १० ॥ नरेश्वर! रथसे आते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ शिखण्डीको युद्धस्थलमें शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने रोका ॥ १० ॥ प्रतिविन्ध्यमथायान्तं मयूरसदृशैर्हयैः । दुःशासनो महाराज यत्तो यत्तमवारयत् ॥ ११ ॥ महाराज! मयूरके समान रंगवाले घोड़ोंद्वारा आते हुए प्रयत्नशील प्रतिविन्ध्यको दुःशासनने यत्नपूर्वक रोका ॥ ११ ॥ भैमसेनिमथायान्तं मायाशतविशारदम् । अश्वत्थामा महाराज राक्षसं प्रत्यषेधयत् ॥ १२ ॥ राजन्! सैकड़ों मायाओंके प्रयोगमें कुशल भीमसेन-कुमार राक्षस घटोत्कचको आते देख अश्वत्थामाने रोका ॥ १२ ॥ द्रुपदं वृषसेनस्तु ससैन्यं सपदानुगम् । वारयामास समरे द्रोणप्रेप्सुं महारथम् ॥ १३ ॥ समरांगणमें द्रोणको पराजित करनेकी इच्छावाले सेना और सेवकोंसहित महारथी द्रुपदको वृषसेनने रोका ॥ १३ ॥ विराटं द्रुतमायान्तं द्रोणस्य निधनं प्रति । मद्रराजः सुसंक्रुद्धो वारयामास भारत ॥ १४ ॥ भारत! द्रोणको मारनेके उद्देश्यसे शीघ्रतापूर्वक आते हुए राजा विराटको अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए मद्रराज शल्यने रोक दिया ॥ १४ ॥ शतानीकमथायान्तं नाकुलिं रभसं रणे । चित्रसेनो रुरोधाशु शरैर्द्रोणपरीप्सया ॥ १५ ॥