भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1244

राजेन्द्र! समरांगणमें धनुष और कवच कट जानेपर महारथी चित्रसेनने दूसरा धनुष हाथमें लिया, जो शत्रुको विदीर्ण करनेमें समर्थ था ॥ ७ ॥

ततस्तूर्णं चित्रसेनो नाकुलिं नवभिः शरैः । विव्याध समरे क्रुद्धो भरतानां महारथः ॥ ८ ॥ उस समय समरभूमिमें कुपित हुए भरतकुलके महारथी वीर चित्रसेनने नकुलपुत्र शतानीकको नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ८ ॥

शतानीकोऽथ संक्रुद्धश्चित्रसेनस्य मारिष । जघान चतुरो वाहान् सारथिं च नरोत्तमः ॥ ९ ॥ माननीय नरेश! तब अत्यन्त कुपित हुए नरश्रेष्ठ शतानीकने चित्रसेनके चारों घोड़ों और सारथिको मार डाला ॥ ९ ॥

अवप्लुत्य रथात् तस्माच्चित्रसेनो महारथः । नाकुलिं पञ्चविंशत्या शराणामार्दयद् बली ॥ १० ॥ तब बलवान् महारथी चित्रसेनने उस रथसे कूदकर नकुलपुत्र शतानीकको पचीस बाण मारे ॥ १० ॥

तस्य तत्कुर्वतः कर्म नकुलस्य सुतो रणे । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद चापं रत्नविभूषितम् ॥ ११ ॥ यह देख रणक्षेत्रमें नकुलपुत्रने पूर्वोक्त कर्म करनेवाले चित्रसेनके रत्नविभूषित धनुषको एक अर्धचन्द्राकार बाणसे काट डाला ॥ ११ ॥

स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । आरुरोह रथं तूर्णं हार्दिक्यस्य महात्मनः ॥ १२ ॥ धनुष कट गया, घोड़े और सारथि मारे गये और वह रथहीन हो गया। उस अवस्थामें चित्रसेन तुरंत भागकर महामना कृतवर्माके रथपर जा चढ़ा ॥ १२ ॥

द्रुपदं तु सहानीकं द्रोणप्रेप्सुं महारथम् । वृषसेनोऽभ्ययात् तूर्णं किरञ्शरशतैस्तदा ॥ १३ ॥ द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये आते हुए महारथी द्रुपदपर वृषसेनने सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते हुए तत्काल आक्रमण कर दिया ॥ १३ ॥

यज्ञसेनस्तु समरे कर्णपुत्रं महारथम् । षष्ट्या शराणां विव्याध बाह्वोरुरसि चानघ ॥ १४ ॥ निष्पाप नरेश! समरांगणमें राजा यज्ञसेन (द्रुपद)-ने महारथी कर्णपुत्र वृषसेनकी छाती और भुजाओंमें साठ बाण मारे ॥ १४ ॥

वृषसेनस्तु संक्रुद्धो यज्ञसेनं रथे स्थितम् । बहुभिः सायकैस्तीक्ष्णैराजघान स्तनान्तरे ॥ १५ ॥