महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1259, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभिर्द्रोणपुत्रस्तु स्वयं द्रोणस्तु सप्तभिः ॥ १५ ॥
तदनन्तर धृष्टद्युम्नको कर्णने दस, अश्वत्थामाने पाँच और स्वयं द्रोणने सात बाण मारे ॥ १५ ॥
शल्यश्च दशभिर्बाणैस्त्रिभिर्दुःशासनस्तथा ।
दुर्योधनस्तु विंशत्या शकुनिश्चापि पञ्चभिः ॥ १६ ॥
फिर शल्यने दस, दुःशासनने तीन, दुर्योधनने बीस और शकुनिने पाँच बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया ॥ १६ ॥
पाञ्चाल्यं त्वरयाविध्यन् सर्व एव महारथाः ।
स विद्धः सप्तभिर्वीरैर्द्रोणस्यार्थे महाहवे ॥ १७ ॥
सर्वानसम्भ्रमाद् राजन् प्रत्यविद्ध्यत् त्रिभिस्त्रिभिः ।
द्रोणं द्रौणिं च कर्णं च विव्याध च तवात्मजम् ॥ १८ ॥
राजन्! इस प्रकार सभी महारथियोंने बड़ी उतावलीके साथ पांचालराजकुमारपर अपने-अपने बाणोंका प्रहार किया। उस महासमरमें द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये सात वीरोंद्वारा घायल किये जानेपर भी धृष्टद्युम्नने बिना किसी घबराहटके उन सबको तीन-तीन बाणोंसे बींध डाला। फिर द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण तथा आपके पुत्र दुर्योधनको भी घायल कर दिया ॥ १७-१८ ॥
ते भिन्ना धन्विना तेन धृष्टद्युम्नं पुनर्मृधे ।
विव्यधुः पञ्चभिस्तूर्णमेकैको रथिनां वरः ॥ १९ ॥
उन धनुर्धर वीर धृष्टद्युम्नके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो उन सभी योद्धाओंने युद्धस्थलमें पुनः उन्हें पाँच-पाँच बाणोंसे शीघ्र ही बींध डाला। प्रत्येक महारथीने उनपर प्रहार किया था ॥ १९ ॥
द्रुमसेनस्तु संक्रुद्धो राजन् विव्याध पत्रिणा ।
त्रिभिश्चान्यैःशरैस्तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २० ॥
राजन्! उस समय द्रुमसेनने अत्यन्त कुपित होकर एक बाणसे धृष्टद्युम्नको बींध डाला। फिर तुरंत ही अन्य तीन बाणोंसे उन्हें घायल करके कहा—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ २० ॥
स तु तं प्रतिविव्याध त्रिभिस्तीक्ष्णैरजिह्मगैः ।
स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैः प्राणान्तकरणैर्युधि ॥ २१ ॥
तब धृष्टद्युम्नने रणभूमिमें सोनेके पंखवाले, शिलापर स्वच्छ किये हुए, तीन तीखे एवं प्राणान्तकारी बाणोंद्वारा द्रुमसेनको घायल कर दिया ॥ २१ ॥
भल्लेनान्येन तु पुनः सुवर्णोज्ज्वलकुण्डलम् ।
निचकर्त शिरः कायाद् द्रुमसेनस्य वीर्यवान् ॥ २२ ॥