महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1268, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षुरप्रैः शातयामास तावकानां स माधवः ॥ ७ ॥ उन मधुवंशी वीरने आपकी सेनाके हाथियोंके शुण्डदण्डों, घोड़ोंकी गर्दनों तथा योद्धाओंकी आयुधोंसहित भुजाओंको भी क्षुरप्रोंद्वारा काट डाला ॥ ७ ॥
पतितैश्चामरैश्चैव श्वेतच्छत्रैश्च भारत । बभूव धरणी पूर्णा नक्षत्रैर्दौरिव प्रभो ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! प्रभो! वहाँ गिरे हुए चामरों और श्वेत छत्रोंसे भरी हुई भूमि नक्षत्रोंसे युक्त आकाशके समान जान पड़ती थी ॥ ८ ॥
एतेषां युयुधानेन युध्यतां युधि भारत । बभूव तुमुलः शब्दः प्रेतानां क्रन्दतामिव ॥ ९ ॥ भारत! युद्धस्थलमें युयुधानके साथ जूझते हुए इन योद्धाओंका भयंकर आर्तनाद प्रेतोंके करुण-क्रन्दन-सा प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
तेन शब्देन महता पूरिताभूद् वसुन्धरा । रात्रिः समभवच्चैव तीव्ररूपा भयावहा ॥ १० ॥ उस महान् कोलाहलसे भरी हुई वह रणभूमि और रात्रि अत्यन्त उग्र एवं भयंकर जान पड़ती थी ॥ १० ॥
दीर्यमाणं बलं दृष्ट्वा युयुधानशराहतम् । श्रुत्वा च विपुलं नादं निशीथे लोमहर्षणे ॥ ११ ॥ सुतस्तवाब्रवीद् राजन् सारथिं रथिनां वरः । यत्रैष शब्दस्तत्राश्वांश्चोदयेति पुनः पुनः ॥ १२ ॥ राजन्! युयुधानके बाणोंसे आहत हुई अपनी सेनामें भगदड़ पड़ी देख और उस रोमांचकारी निशीथकालमें वह महान् कोलाहल सुनकर रथियोंमें श्रेष्ठ आपके पुत्र दुर्योधनने अपने सारथिसे बारंबार कहा—'जहाँ यह कोलाहल हो रहा है, वहाँ मेरे घोड़ोंको हाँक ले चलो' ॥ ११-१२ ॥
तेन संचोद्यमानस्तु ततस्तांस्तुरगोत्तमान् । सूतः संचोदयामास युयुधानरथं प्रति ॥ १३ ॥ उसका आदेश पाकर सारथिने उन श्रेष्ठ घोड़ोंको सात्यकिके रथकी ओर हाँक दिया ॥ १३ ॥
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो दृढधन्वा जितक्लमः । शीघ्रहस्तश्चित्रयोधी युयुधानमुपाद्रवत् ॥ १४ ॥ तदनन्तर दृढ़ धनुर्धर, श्रमविजयी, शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले और विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले दुर्योधनने क्रोधमें भरकर सात्यकिपर धावा किया ॥ १४ ॥
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैः शोणितभोजनैः । दुर्योधनं द्वादशभिर्माधवः प्रत्यविध्यत ॥ १५ ॥