महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1277, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंरश्मिभिर्भास्करो राजंस्तमांसीव समन्ततः । प्रजापालक नरेश! जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा चारों ओरके अन्धकारको दूर कर देते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य वहाँ क्षत्रियोंके प्राण लेने लगे ॥ १४ १/२ ॥ द्रोणेन वध्यमानानां पञ्चालानां विशाम्पते ॥ १५ ॥ शुश्रुवे तुमुलः शब्दः क्रोशतामितरेतरम् । प्रजानाथ! द्रोणाचार्यकी मार खाकर परस्पर चीखते-चिल्लाते हुए पांचालोंका घोर आर्तनाद सुनायी देने लगा ॥ १५ १/२ ॥ पुत्रानन्ये पितॄनन्ये भ्रातॄनन्ये च मातुलान् ॥ १६ ॥ भागिनेयान् वयस्यांश्च तथा सम्बन्धिबान्धवान् । उत्सृज्योत्सृज्य गच्छन्ति त्वरिता जीवितेप्सवः ॥ १७ ॥ कोई पुत्रोंको, कोई पिताओंको, कोई भाइयोंको, कोई मामा, भानजों, मित्रों, सम्बन्धियों तथा बन्धु-बान्धवोंको छोड़-छोड़कर अपनी जान बचानेके लिये तुरंत ही भाग चले ॥ १६-१७ ॥ अपरे मोहिता मोहात् तमेवाभिमुखा ययुः । पाण्डवानां रणे योधाः परलोकं गताः परे ॥ १८ ॥ कुछ पाण्डव-सैनिक रणभूमिमें मोहित होकर मोहवश पुनः द्रोणाचार्यके ही सामने चले गये और मारे गये। बहुत-से सैनिक परलोक सिधार गये ॥ १८ ॥ सा तथा पाण्डवी सेना पीड्यमाना महात्मना । निशि सम्प्राद्रवद् राजन्नुत्सृज्योल्काः सहस्रशः ॥ १९ ॥ पश्यतो भीमसेनस्य विजयस्याच्युतस्य च । यमयोर्धर्मपुत्रस्य पार्षतस्य च पश्यतः ॥ २० ॥ महामना द्रोणाचार्यसे इस प्रकार पीड़ित हुई वह पाण्डव-सेना उस रातके समय सहस्रों मशालें फेंक-फेंककर भीमसेन, अर्जुन, श्रीकृष्ण, नकुल, सहदेव, धर्मपुत्र युधिष्ठिर और धृष्टद्युम्नके सामने ही उनके देखते-देखते भाग रही थी ॥ १९-२० ॥ तमसा संवृते लोके न प्राज्ञायत किंचन । कौरवाणां प्रकाशेन दृश्यन्ते विद्रुताः परे ॥ २१ ॥ उस समय पाण्डवदल अन्धकारसे आच्छन्न हो गया था। किसीको कुछ जान नहीं पड़ता था। कौरवदलमें जो प्रकाश हो रहा था, उसीसे कुछ भागते हुए सैनिक दिखायी देते थे ॥ २१ ॥ द्रवमाणं तु तत् सैन्यं द्रोणकर्णौ महारथौ । जघ्नतुः पृष्ठतो राजन् किरन्तौ सायकान् बहून् ॥ २२ ॥ राजन्! महारथी द्रोणाचार्य और कर्ण बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए उस भागती हुई पाण्डव-सेनाको पीछेसे मार रहे थे ॥ २२ ॥