भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 3237 में से

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उसके भीतर सैकड़ों लाशें बह रही थीं। केश सेवार तथा घासोंके समान प्रतीत होते थे। राजन्! इस प्रकार द्रोणाचार्यने वहाँ खूनकी नदी बहायी थी, जो कायरोंका भय बढ़ानेवाली थी ॥ १९ ॥ तर्जयन्तमनीकानि तानि तानि महारथम् । सर्वतोऽभ्यद्रवन् द्रोणं युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ २० ॥ उस समय समस्त सेनाओंको अपने गर्जन-तर्जनसे डराते हुए महारथी द्रोणाचार्यपर युधिष्ठिर आदि योद्धा सब ओरसे टूट पड़े ॥ २० ॥ तानभिद्रवतः शूरांस्तावका दृढविक्रमाः । सर्वतः प्रत्यगृह्णन्त तदभूल्लोमहर्षणम् ॥ २१ ॥ उन आक्रमण करनेवाले पाण्डव वीरोंको आपके सुदृढ़ पराक्रमी सैनिकोंने सब ओरसे रोक दिया। उस समय दोनों दलोंमें रोमांचकारी युद्ध होने लगा ॥ २१ ॥ शतमायस्तु शकुनिः सहदेवं समाद्रवत् । सनियन्तृध्वजरथं विव्याध निशितैः शरैः ॥ २२ ॥ सैकड़ों मायाओंको जाननेवाले शकुनिने सहदेवपर धावा किया और उनके सारथि, ध्वज एवं रथसहित उन्हें अपने पैने बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २२ ॥ तस्य माद्रीसुतः केतुं धनुः सूतं हयानपि । नातिक्रुद्धः शरैश्छित्त्वा षष्ट्या विव्याध सौबलम् ॥ २३ ॥ तब माद्रीकुमार सहदेवने अधिक कुपित न होकर शकुनिके ध्वज, धनुष, सारथि और घोड़ोंको अपने बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न करके साठ बाणोंसे सुबलपुत्र शकुनिको भी बींध डाला ॥ २३ ॥ सौबलस्तु गदां गृह्य प्रचस्कन्द रथोत्तमात् । स तस्य गदया राजन् रथात् सूतमपातयत् ॥ २४ ॥ यह देख सुबलपुत्र शकुनि गदा हाथमें लेकर उस श्रेष्ठ रथसे कूद पड़ा। राजन्! उसने अपनी गदाद्वारा सहदेवके रथसे उनके सारथिको मार गिराया ॥ २४ ॥ ततस्तौ विरथौ राजन् गदाहस्तौ महाबलौ । चिक्रीडतू रणे शूरौ सशृङ्गाविव पर्वतौ ॥ २५ ॥ महाराज! उस समय वे दोनों महाबली शूरवीर रथहीन हो गदा हाथमें लेकर रणक्षेत्रमें खेल-सा करने लगे, मानो शिखरवाले दो पर्वत परस्पर टकरा रहे हों ॥ २५ ॥ द्रोणः पाञ्चालराजानं विद्ध्वा दशभिराशुगैः । बहुभिस्तेन चाभ्यस्तस्तं विव्याध ततोऽधिकैः ॥ २६ ॥ द्रोणाचार्यने पांचालराज द्रुपदको दस शीघ्रगामी बाणोंसे बींध डाला। फिर द्रुपदने भी बहुत-से बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया। तब द्रोणने भी और अधिक सायकोंद्वारा द्रुपदको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २६ ॥

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