भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1291

अलमेवास्मि कर्णाय द्रोणायालं च भारत । अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणां महात्मनाम् ॥ ६३ ॥ **घटोत्कचने कहा—**महाबाहो! प्रभो! आप मुझे जैसा कह रहे हैं, वैसा ही है। मैं आपका भेजा हुआ कर्णके वधकी इच्छासे जा रहा हूँ। भारत! मैं कर्णका सामना करनेमें तो समर्थ हूँ ही, द्रोणाचार्यका भी अच्छी तरह सामना कर सकता हूँ। अस्त्र-विद्याके जाननेवाले ये जो दूसरे महामनस्वी क्षत्रिय हैं, उनके साथ भी लोहा ले सकता हूँ॥ ६३ ॥ अद्य दास्यामि संग्रामं सूतपुत्राय तं निशि । यं जनाः सम्प्रवक्ष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति ॥ ६४ ॥ आज मैं इस रातमें सूतपुत्र कर्णके साथ ऐसा संग्राम करूँगा, जिसकी चर्चा जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक लोग करते रहेंगे॥ ६४ ॥ न चात्र शूरान् मोक्ष्यामि न भीतान्न कृताञ्जलीन् । सर्वानैव वधिष्यामि राक्षसं धर्ममास्थितः ॥ ६५ ॥ इस युद्धमें मैं न तो शूरवीरोंको जीवित छोड़ूँगा, न डरनेवालोंको और न हाथ जोड़नेवालोंको ही। राक्षस-धर्मका आश्रय लेकर सबका ही संहार कर डालूँगा॥ ६५ ॥

संजय उवाच

एवमुक्त्वा महाबाहुर्हैडिम्बिवरवीरहा । अभ्ययात् तुमुले कर्णं तव सैन्यं विभीषयन् ॥ ६६ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! श्रेष्ठ वीरोंका संहार करनेवाला महाबाहु हिडिम्बाकुमार ऐसा कहकर उस भयंकर युद्धमें आपकी सेनाको भयभीत करता हुआ कर्णका सामना करनेके लिये गया॥ ६६ ॥ तमापतन्तं संक्रुद्धं दीप्तास्यं दीप्तमूर्धजम् । प्रहसन् पुरुषव्याघ्रः प्रतिजग्राह सूतजः ॥ ६७ ॥ क्रोधमें भरे हुए उस प्रज्वलित मुख और चमकीले केशोंवाले राक्षसको आते हुए देख पुरुषसिंह सूतपुत्र कर्णने हँसते हुए उसे अपने प्रतिद्वन्द्वीके रूपमें ग्रहण किया॥ ६७ ॥ तयोः समभवद् युद्धं कर्णराक्षसयोर्मृधे । गर्जतो राजशार्दूल शक्रप्रह्लादयोरिव ॥ ६८ ॥ नृपश्रेष्ठ! संग्रामभूमिमें गर्जना करते हुए कर्ण और राक्षस दोनोंमें इन्द्र और प्रह्लादके समान युद्ध होने लगा॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे घटोत्कचप्रोत्साहने त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय 'घटोत्कचको भगवान्‌का प्रोत्साहन देना' विषयक एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा