महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1296, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षितिकम्पे यथा शैलः सवृक्षस्तृणगुल्मवान् ॥ २३ ॥
उसके मुक्केकी मार खाकर घटोत्कच उसी प्रकार काँप उठा, जैसे भूकम्प होनेपर वृक्ष, तृण और गुल्मोंसहित पर्वत हिलने लगता है ॥ २३ ॥
ततः स परिघाभेन द्विषत्संघघ्नेन बाहुना ।
जाटासुरिं भैमसेनिरवधीन्मुष्टिना भृशम् ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् भीमसेनपुत्र घटोत्कचने शत्रुसमूहोंका नाश करनेवाली अपनी परिघ-जैसी मोटी बाँहके मुक्केसे जटासुरके पुत्रको बहुत मारा ॥ २४ ॥
तं प्रमथ्य ततः क्रुद्धस्तूर्णं हैडिम्बिराक्षिपत् ।
दोर्भ्यामिन्द्रध्वजाभाभ्यां निष्पिषेष च भूतले ॥ २५ ॥
क्रोधमें भरे हुए हिडिम्बाकुमारने उसे अच्छी तरह मथकर तुरंत ही धरतीपर दे मारा और इन्द्र-ध्वजके समान अपनी दोनों भुजाओंद्वारा उसे भूतलपर रगड़ना आरम्भ किया ॥ २५ ॥
जाटासुरिर्मोक्षयित्वा आत्मानं च घटोत्कचात् ।
पुनरुत्थाय वेगेन घटोत्कचमुपाद्रवत् ॥ २६ ॥
तब जटासुरका पुत्र अपने-आपको घटोत्कचके बन्धनसे छुड़ाकर पुनः उठ गया और बड़े वेगसे उसकी ओर झपटा ॥ २६ ॥
अलम्बुषोऽपि विक्षिप्य समुत्क्षिप्य च राक्षसम् ।
घटोत्कचं रणे रोषान्निष्पिषेष च भूतले ॥ २७ ॥
अलम्बुषने भी झटका देकर रणभूमिमें राक्षस घटोत्कचको उठाकर पटक दिया और रोषपूर्वक वह उसे पृथ्वीपर रगड़ने लगा ॥ २७ ॥
तयोः समभवद् युद्धं गर्जतोर्तिकाययोः ।
घटोत्कचालम्बुषयोस्तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ २८ ॥
गरजते हुए उन दोनों विशालकाय राक्षस घटोत्कच और अलम्बुषका वह युद्ध बड़ा ही भयंकर और रोमांचकारी था ॥ २८ ॥
विशेषयन्तावन्योन्यं मायाभिरतिमायिनौ ।
युयुधाते महावीर्याविन्द्रवैरोचनाविव ॥ २९ ॥
इन्द्र और बलिके समान महापराक्रमी वे दोनों अत्यन्त मायावी राक्षस अपनी मायाओंद्वारा एक-दूसरेसे बढ़ जानेकी चेष्टा करते हुए परस्पर युद्ध कर रहे थे ॥
पावकाम्बुनिधी भूत्वा पुनर्गरुडतक्षकौ ।
पुनर्मेघमहावातौ पुनर्वज्रमहाचलौ ॥ ३० ॥
एकने आग बनकर आक्रमण किया तो दूसरेने महासागर बनकर उसे बुझा दिया। इसी प्रकार एक तक्षक नाग बना तो दूसरा गरुड़। फिर एक मेघ बना तो दूसरा प्रचण्ड वायु।