महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1299, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! तत्पश्चात् वह दुर्योधनसे इस प्रकार बोला—‘यह है तेरा सहायक बन्धु, इसे मैंने मार डाला। तूने देख लिया न इसका पराक्रम? ।। ४१ ।।
पुनर्द्रष्टासि कर्णस्य निष्ठामेतां तथाऽऽत्मनः ।
स्वधर्ममर्थं कामं च त्रितयं योऽभिवाञ्छति ।। ४२ ।।
रिक्तपाणिर्न पश्येत राजानं ब्राह्मणं स्त्रियम् ।
‘अब तू कर्णकी तथा अपनी भी फिर ऐसी ही अवस्था देखेगा। जो अपने धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी इच्छा रखता है, उसे राजा, ब्राह्मण और स्त्रीसे खाली हाथ नहीं मिलना चाहिये (इसीलिये तेरे मित्रका यह मस्तक मैं भेंटके तौरपर लाया हूँ) ।। ४२ १/२ ।।
तिष्ठस्व तावत् सुप्रीतो यावत् कर्णं वधाम्यहम् ।। ४३ ।।
एवमुक्त्वा ततः प्रायात् कर्णं प्रति नरेश्वर ।
किरन् शरगणांस्तीक्ष्णान् रुषितो रणमूर्धनि ।। ४४ ।।
‘तू तबतक यहाँ प्रसन्नतापूर्वक खड़ा रह, जबतक कि मैं कर्णका वध नहीं कर लेता।’ नरेश्वर! ऐसा कहकर क्रोधमें भरा हुआ घटोत्कच तीखे बाणसमूहोंकी वर्षा करता हुआ युद्धके मुहानेपर कर्णके पास चला गया ।। ४३-४४ ।।
ततः समभवद् युद्धं घोररूपं भयानकम् ।
विस्मापनं महाराज नरराक्षसयोर्मृधे ।। ४५ ।।
महाराज! तदनन्तर रणभूमिमें सबको विस्मयमें डालनेवाला मनुष्य और राक्षसका वह घोर एवं भयानक युद्ध आरम्भ हो गया ।। ४५ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे अलम्बुषवधे
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें अलम्बुषवधविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७४ ।।